दून पुस्तकालय में साहित्यिक महफिल, अनीता सोनी की पुस्तक ‘छंद मकरंद मेरे गीत’ का लोकार्पण
- गीतों में प्रेम, वीरता और सांस्कृतिक चेतना का संगम; साहित्यकारों ने छंदबद्ध रचनाओं को हिंदी गीत परंपरा के लिए बताया महत्वपूर्ण योगदान
देहरादून। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में सोमवार को साहित्यिक विमर्श और काव्य संवेदना से सराबोर शाम देखने को मिली। यहां कवयित्री अनीता सोनी की काव्य कृति ‘छंद मकरंद मेरे गीत’ का लोकार्पण किया गया।
इस अवसर पर साहित्यकारों, लेखकों और साहित्य प्रेमियों ने पुस्तक के गीतों, छंद विधान, भाव-संवेदना और हिंदी गीत परंपरा की प्रासंगिकता पर अपने विचार साझा किए।
कार्यक्रम की शुरुआत दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी के स्वागत संबोधन से हुई।
उन्होंने अतिथियों, साहित्यकारों और उपस्थित लोगों का स्वागत करते हुए कहा कि पुस्तकालय केवल पुस्तकों के संग्रह और अध्ययन का स्थान नहीं, बल्कि विचारों के आदान-प्रदान, साहित्यिक संवाद और सांस्कृतिक चेतना के विस्तार का जीवंत केंद्र भी है।
पुस्तक लोकार्पण जैसे आयोजन रचनाकारों और पाठकों के बीच आत्मीय संबंध स्थापित करने के साथ साहित्य की विविध विधाओं को समाज के सामने लाने का अवसर प्रदान करते हैं।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि पुष्पा मानस ने पुस्तक के गीतों की सराहना करते हुए कहा कि अनीता सोनी की रचनाओं में भावों की मधुरता और छंदों की लयात्मकता स्पष्ट दिखाई देती है।
उन्होंने ‘मृदुला’ गीत को प्रेम की कोमल अनुभूतियों की सुंदर अभिव्यक्ति बताया। वहीं ‘गढ़वीर’ गीत में गढ़वाली सैनिक के राष्ट्रप्रेम, वीरता और दृढ़ चरित्र का चित्रण उल्लेखनीय है।
कर्ण पर आधारित ‘तेजस’ गीत में उन्होंने रामधारी सिंह दिनकर की ‘रश्मिरथी’ की स्मृति का उल्लेख किया। माधो सिंह भंडारी के साहस और बलिदान पर आधारित रचना को भी ऐतिहासिक चेतना जगाने वाला प्रयास बताया।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के महानायकों पर लिखे गए ऐसे गीत हमारी सांस्कृतिक स्मृति को मजबूत करते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. असीम शुक्ल ने कहा कि छंदबद्ध रचना विधान और विशेषकर गीतों के माध्यम से यह संग्रह गीत विधा की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।
उन्होंने विश्वास जताया कि यह कृति गीत-विमर्श के क्षेत्र में उल्लेखनीय स्थान बनाएगी और छंद की साहित्यिक गरिमा एवं प्रासंगिकता को नए सिरे से रेखांकित करेगी।
डॉ. बिहारी लाल दनोसी ने अपनी पुत्री अनीता सोनी के चार गीतों पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इन रचनाओं में उनकी रचनाशीलता और साहित्यिक साधना स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित होती है।
वहीं डॉली डबराल ने कहा कि साहित्य के प्रति अनीता सोनी की अटूट श्रद्धा और विश्वास उनके गीतों में दिखाई देता है।
पुरातन और नवीन समाज में नारी शक्ति की भूमिका, भावों का अंतर्प्रवाह तथा चिंतन और अनुभूति की समरसता उनकी रचनाओं को प्रभावशाली बनाती है। विविध छंदों का प्रयोग भी इस संग्रह को विशिष्ट बनाता है।
बीना बैंजवाल ने कवयित्री को बधाई देते हुए आशा व्यक्त की कि उनकी लेखनी की मधुरता और छंदों की अनुशासित लय हिंदी गीत परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान करेगी।
डॉ. राम विनय सिंह ने कहा कि गीत और छंद संवेदनाओं की कोमलता, अभिव्यक्ति की मधुरता और भाषा के सौंदर्य का संगम हैं। यह कृति हिंदी गीत परंपरा को समृद्ध करने वाला सराहनीय प्रयास है। शिवमोहन सिंह ने भी पुस्तक पर अपने विचार रखे।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. क्षमा कौशिक ने किया। इस दौरान वक्ताओं ने पुस्तक की रचनात्मक विशेषताओं के साथ गीत और छंद की वर्तमान प्रासंगिकता पर भी चर्चा की। उपस्थित साहित्यकारों और पाठकों ने कृति को हिंदी साहित्य की गीत परंपरा में सार्थक योगदान बताया।
कार्यक्रम के अंत में सोनी परिवार की ओर से सभी साहित्यकारों, अतिथियों और उपस्थित जनों का आभार व्यक्त किया गया। परिवार ने इस अवसर को अविस्मरणीय बताते हुए सुधी पाठकों और साहित्य प्रेमियों के प्रति कृतज्ञता जताई।
इस अवसर पर पुस्तकालयाध्यक्ष डीके पांडे, सुरेंद्र सजवाण, रुक्मणी दनोसी, जगदम्बा मैठाणी, सुंदर सिंह बिष्ट, डॉ. अरुण कुकसाल, लक्ष्मी प्रसाद बडोनी, डॉ. गोविंद सिंह कौंडल, रजनीश त्रिवेदी, रमाकांत बेंजवाल, प्रीति थपलियाल, सत्य प्रकाश, कांता डंगवाल, कविता बिष्ट, प्रो. लक्ष्मी कौंडल, जगदीश सिंह महर, गंगाधर प्रसाद, प्रो. मधु प्रसाद, मंजू सिंह, रजनी मुयाल, अमन सोनी और साक्षी सोनी सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, लेखक, प्रबुद्ध पाठक और साहित्य प्रेमी मौजूद रहे।



