विरासत में सुर, ताल और हुनर का संगम, ओसमान मीर की गायकी पर झूमे श्रोता
- मास्टर शिल्पकारों के साथ 80 बच्चों ने सीखी हस्तशिल्प की बारीकियां, कैम्ब्रियन हॉल के 54 विद्यार्थियों ने ‘सांसों की माला’ से बांधा समां; ओसमान मीर की गायकी ने जमाया रंग
देहरादून। विरासत महोत्सव-2026 में सोमवार को भारतीय कला, संस्कृति, संगीत और शिल्प का अनूठा संगम देखने को मिला। महोत्सव के दौरान जहां मास्टर शिल्पकारों के मार्गदर्शन में स्कूली बच्चों के लिए हस्तशिल्प कार्यशालाओं का आयोजन किया गया।
वहीं शाम को सूफियाना संगीत, भरतनाट्यम, ओडिसी और कथक की मनमोहक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। सुप्रसिद्ध गायक ओसमान मीर और आमिर मीर की मधुर गायकी ने सांस्कृतिक संध्या को यादगार बना दिया।
80 बच्चों ने पांच पारंपरिक हस्तशिल्प कलाओं में दिखाया हुनर
विरासत महोत्सव के तहत सुबह के सत्र में पांच अलग-अलग स्कूलों के 80 विद्यार्थियों ने हस्तशिल्प कार्यशालाओं में प्रतिभाग किया।
मास्टर शिल्पकारों के मार्गदर्शन में आयोजित इन कार्यशालाओं का उद्देश्य बच्चों को भारतीय पारंपरिक कला और शिल्प से परिचित कराना तथा उनकी रचनात्मक प्रतिभा को निखारना रहा।
कार्यशाला में ऐपन कला, सांझी कला, टेराकोटा, फूल बनाने की कला और टाई-एंड-डाई जैसी विधाओं का प्रशिक्षण दिया गया। बच्चों ने इन कलाओं की बारीकियां सीखने के साथ अपनी कल्पनाशीलता को आकर्षक कलाकृतियों के रूप में प्रस्तुत किया।
मिट्टी से तैयार की गई कलाकृतियों और बच्चों के हुनर ने वहां मौजूद अतिथियों को भी प्रभावित किया। इस पहल के जरिए विद्यार्थियों को पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प विरासत से जुड़ने का अवसर मिला।
कैम्ब्रियन हॉल के विद्यार्थियों ने ‘सांसों की माला’ से बांधा समां
विरासत की सांस्कृतिक संध्या में कैम्ब्रियन हॉल के छात्र-छात्राओं ने सूफियाना संगीत की शानदार प्रस्तुति दी। विद्यालय के 54 विद्यार्थियों ने प्रसिद्ध सूफी गायक नुसरत फतेह अली खान के लोकप्रिय गीत ‘सांसों की माला’ को सामूहिक रूप से प्रस्तुत किया।
विद्यार्थियों की सुरीली आवाज और शानदार सामूहिक तालमेल ने दर्शकों को सूफियाना संगीत की भावपूर्ण दुनिया में पहुंचा दिया।
प्रस्तुति के दौरान पूरा माहौल संगीत की धुनों से सराबोर नजर आया। विद्यार्थियों ने अपनी संगीत प्रतिभा और सुरों के खूबसूरत संयोजन से दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी। उनकी इस प्रस्तुति ने विरासत महोत्सव की सांस्कृतिक महफिल में एक अलग ही रंग भर दिया।
भरतनाट्यम, ओडिसी और कथक की संयुक्त प्रस्तुति ने मोहा मन
सांस्कृतिक संध्या में भारतीय शास्त्रीय नृत्य की तीन प्रमुख विधाओं भरतनाट्यम, ओडिसी और कथक की संयुक्त प्रस्तुति भी आकर्षण का केंद्र रही। भरतनाट्यम में आरोही मुंशी, ओडिसी में वाणी माधव और कथक में मौमाला नायक ने अपनी कला का प्रदर्शन किया।
तीनों कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय नृत्य की विविधता, सौंदर्य और समृद्ध परंपरा को मंच पर जीवंत कर दिया।
इस प्रस्तुति का संगीत निर्देशन और गायन सुधा रघुरामन ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत नागेंद्र राग से हुई, जिसके बाद यमन और शिवरंजनी रागों में झपताल पर आधारित रचनाएं प्रस्तुत की गईं।
वाद्य संगत में प्रफुल्ल कुमार मंगराज ने पखावज, एमवी चंद्रशेखर ने मृदंगम, अब्दुल रहमान ने तबला और जय रघुरामन ने बांसुरी पर साथ दिया। संगीत और नृत्य के इस अद्भुत तालमेल ने दर्शकों को भारतीय शास्त्रीय कलाओं की गहराई और सुंदरता का अनुभव कराया।
ओसमान मीर की बुलंद आवाज ने बांधा समां
विरासत महोत्सव की सांस्कृतिक संध्या का एक प्रमुख आकर्षण सुप्रसिद्ध गायक ओसमान मीर और आमिर मीर की गायकी रही। दोनों कलाकारों की मधुर और प्रभावशाली प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
मंच पर उनके साथ तबले पर अब्दुल मीर और अय्यूब मीर, ढोलक पर हारून, ऑक्टोपैड पर इरशाद, कीबोर्ड पर चंदन और अन्य वाद्य संगत पर युसुफ ने साथ दिया।
गुजरात के कच्छ क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले ओसमान मीर भारतीय शास्त्रीय, अर्धशास्त्रीय, सूफी, भजन, गजल और गुजराती लोक संगीत के लोकप्रिय कलाकार हैं। संगीत उन्हें विरासत में मिला। उनके पिता तबला वादक थे और गुजराती लोकगीतों, भजनों तथा संतवाणी गायकों के साथ संगत करते थे।
ओसमान मीर ने बचपन में ही पिता से तबला सीखना शुरू कर दिया था। बाद में गायन के प्रति अपनी रुचि को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने अपने पिता और गुरु इस्माइल दातार से संगीत की शिक्षा ली।
मोरारी बापू के आश्रम में प्रस्तुतियों के जरिए उनकी गायन यात्रा को नई पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने देश-विदेश के मंचों पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
वह लगभग 58 गुजराती फिल्मों में पार्श्व गायन कर चुके हैं और दुनिया के 25 देशों में अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं। संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गोलियों की रासलीला राम-लीला’ में उनके गायन को भी काफी सराहना मिली।
विरासत महोत्सव में सोमवार को आयोजित कार्यक्रमों ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत केवल मंचीय प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी को पारंपरिक कला, संगीत और शिल्प से जोड़ना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सुबह बच्चों की हस्तशिल्प प्रतिभा से लेकर शाम की शास्त्रीय और सूफियाना महफिल तक, पूरा आयोजन भारतीय संस्कृति के विविध रंगों से सराबोर रहा



