बिग ब्रेकिंग: जातिसूचक गाली से लेकर POCSO तक… हाईकोर्ट के 17 बड़े फैसलें, आप भी पढ़ें….

जातिसूचक गाली से लेकर POCSO तक… हाईकोर्ट के 17 बड़े फैसलें, आप भी पढ़ें….

High Court Weekly Roundup: देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (26 से 30 अक्टूबर 2026) के दौरान कई महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई हुई।

कहीं जातिसूचक गालियों को लेकर SC/ST एक्ट के प्रावधानों की व्याख्या की गई तो कहीं POCSO मामलों में पीड़िताओं के अधिकारों को लेकर अहम आदेश दिए गए।

दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराने को अपने आप में मानहानि नहीं माना, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ्लैट मालिकों की सहमति के बिना बिल्डिंग का नक्शा बदलने पर सख्त रुख अपनाया।

आजम खान और अब्दुल्ला आजम को भी दो पैन कार्ड मामले में राहत मिली। आइए, जानते हैं पिछले सप्ताह के प्रमुख हाईकोर्ट के फैसलों और आदेशों के बारे में।

वकील के ऑफिस में जातिसूचक गालियां देना भी ‘पब्लिक व्यू’ के दायरे में: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी वकील का कार्यालय भी SC/ST एक्ट के तहत ‘पब्लिक व्यू’ यानी सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में आ सकता है। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि घटना के समय वहां आम लोग या अन्य मुवक्किल मौजूद थे या नहीं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी स्थान का निजी होना अपने आप में उसे सार्वजनिक दृष्टि के दायरे से बाहर नहीं करता।

जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने एक महिला और उसकी मां की याचिका खारिज करते हुए उनके खिलाफ SC/ST एक्ट की धाराओं 3(1)(r) और 3(1)(s) तथा भारतीय न्याय संहिता के तहत शुरू आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया।

सिर्फ पुलिस में शिकायत दर्ज कराना मानहानि नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस में शिकायत दर्ज कराना अपने आप में मानहानि नहीं माना जा सकता। किसी शिकायत में लगाए गए आरोपों को उनके वास्तविक संदर्भ में देखना जरूरी है।

सिविल मानहानि के मामले में यह भी साबित होना चाहिए कि संबंधित बयान सार्वजनिक किया गया और उससे किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने एक वकील की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। वकील ने दूसरे वकील के खिलाफ 10 लाख रुपये का मानहानि मुकदमा दायर किया था, जिसे निचली अदालत ने खारिज कर दिया था।

ट्रायल शुरू होने तक पीड़िता बालिग हो जाए, फिर भी बंद कमरे में होगी गवाही: गुजरात हाईकोर्ट

गुजरात हाईकोर्ट ने POCSO मामलों में पीड़िताओं की सुरक्षा को लेकर अहम फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि कथित यौन अपराध के समय पीड़िता नाबालिग थी, लेकिन मुकदमे की सुनवाई शुरू होने तक वह 18 वर्ष की हो गई, तब भी उसकी गवाही बंद कमरे में दर्ज करने का प्रावधान लागू रहेगा।

जस्टिस मूल चंद त्यागी ने स्पष्ट किया कि ट्रायल के समय पीड़िता के बालिग हो जाने से POCSO एक्ट के तहत मिलने वाली प्रक्रियात्मक सुरक्षा समाप्त नहीं हो जाती।

माता-पिता को POCSO अपराध की शिकायत करने से रोकना धारा 21 के तहत अपराध नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि किसी नाबालिग के माता-पिता को POCSO एक्ट के तहत आने वाले अपराध की रिपोर्ट करने से रोकना, अधिनियम की धारा 21 के तहत दंडनीय अपराध नहीं है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 21 का प्रावधान अपराध की जानकारी होने के बावजूद उसकी रिपोर्ट नहीं करने से संबंधित है। किसी व्यक्ति को शिकायत दर्ज कराने से रोकने की कार्रवाई अपने आप में इस धारा के तहत अपराध नहीं बनती।

एक ही घटना में दो बार स्तनों को छूना गंभीर यौन हमला: सिक्किम हाईकोर्ट

सिक्किम हाईकोर्ट ने कहा कि एक ही घटना के दौरान किसी बच्चे के स्तनों को दो बार छूना POCSO एक्ट की धारा 9(l) के तहत गंभीर यौन हमला माना जा सकता है।

जस्टिस भास्कर राज प्रधान ने कहा कि एक ही घटना में बार-बार यौन हमला किए जाने की स्थिति भी इस प्रावधान के दायरे में आती है। कोर्ट ने पीड़िता की गवाही को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि उसके बयान से आरोपी द्वारा दो बार इस तरह की हरकत किए जाने की बात साबित हुई।

पत्नी, बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता का भरण-पोषण पति का पवित्र दायित्व: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी, नाबालिग बच्चों और आर्थिक रूप से असमर्थ बुजुर्ग माता-पिता का भरण-पोषण करना पति का केवल कानूनी ही नहीं, बल्कि पवित्र दायित्व भी है।

जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की पीठ ने इस संबंध में मनुस्मृति के अध्याय 11 के श्लोक 10 का हवाला दिया। अदालत कानपुर नगर की फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग को लेकर पत्नी की ओर से दाखिल क्रिमिनल रिवीजन पर सुनवाई कर रही थी।

फ्लैट मालिकों की लिखित सहमति के बिना बिल्डर नहीं बदल सकता नक्शा, अवैध निर्माण तोड़ने के आदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिल्डरों और प्रमोटरों की मनमानी पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि अपार्टमेंट की मूल योजना, निर्माण संबंधी विनिर्देश या साझा सुविधाओं में बदलाव करने से पहले सभी फ्लैट मालिकों की लिखित सहमति लेना अनिवार्य है।

जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने कहा कि केवल स्वीकृत FAR की सीमा के भीतर निर्माण होने का तर्क देकर नियमों से बचा नहीं जा सकता। अदालत ने अवैध निर्माण ध्वस्त करने और FIR दर्ज करने का आदेश भी दिया।

दो पैन कार्ड मामले में आजम खान और अब्दुल्ला आजम को राहत, सजा पर रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कथित दो पैन कार्ड मामले में उत्तर प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम खान को राहत दी।

जस्टिस समित गोपाल की पीठ ने दोनों की सजा पर रोक लगाते हुए उनकी जमानत याचिकाएं स्वीकार कर लीं। कोर्ट के इस आदेश से दोनों के जेल से बाहर आने का रास्ता साफ हो सकता है।

पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट की ट्रस्टीशिप वसीयत से किसी और को नहीं सौंपी जा सकती: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट का ट्रस्टी अपनी वसीयत के जरिए अपने पद का उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं कर सकता।

ट्रस्टीशिप विश्वास पर आधारित व्यक्तिगत जिम्मेदारी है, जिसे विरासत के रूप में हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस दीपक गुप्ता ने फरीदाबाद के जनहित सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि सार्वजनिक ट्रस्ट का प्रबंधन किसी परिवार का वंशानुगत अधिकार नहीं बन सकता।

पुरानी सजा रद्द होने के बावजूद लंबित विभागीय जांच प्रमोशन में बन सकती है बाधा: त्रिपुरा हाईकोर्ट

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच लंबित होने पर उसे प्रमोशन से रोका जा सकता है, भले ही पहले दी गई सजा रद्द हो चुकी हो।

कोर्ट ने त्रिपुरा पुलिस सेवा ग्रेड-II में पूर्व प्रभाव से प्रमोशन की मांग करने वाले एक पुलिस इंस्पेक्टर की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि बाद में शुरू हुई विभागीय कार्यवाही पूरी होने तक प्रमोशन का आदेश नहीं दिया जा सकता।

शराब को लेकर विवाद में चाकू से वार, पूर्व नियोजित हत्या नहीं: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि अचानक हुए विवाद के दौरान आवेश में आकर बिना किसी पूर्व योजना के चाकू से वार करना भारतीय दंड संहिता की धारा 300 के अपवाद-4 के दायरे में आ सकता है।

ऐसे मामले में अपराध हत्या के बजाय गैर-इरादतन हत्या की श्रेणी में आ सकता है। कोर्ट ने 88 वर्षीय पिता की हत्या के मामले में दोषसिद्धि को बदलते हुए अपराध को IPC की धारा 304 भाग-II के तहत माना।

मामले में शराब पीने को लेकर हुए विवाद के दौरान पिता ने बेटे को चाकू मार दिया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी।

IPC की धारा 467 के तहत जालसाजी जघन्य नहीं, गंभीर अपराध: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किशोर न्याय अधिनियम के तहत अपराधों की श्रेणी को लेकर महत्वपूर्ण व्याख्या की।

कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 467 के तहत जालसाजी का अपराध जघन्य अपराध की श्रेणी में नहीं आता, क्योंकि इसमें न्यूनतम सात साल की सजा का प्रावधान नहीं है। जस्टिस जय प्रकाश तिवारी की पीठ ने इसे किशोर न्याय अधिनियम के तहत गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा।

अविवाहित बहन भी किसान बीमा योजना के तहत पांच लाख रुपये की हकदार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना के तहत अहम फैसला देते हुए कहा कि किसी अविवाहित बहन को केवल इसलिए दुर्घटना मृत्यु बीमा की पांच लाख रुपये की राशि से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसका नाम योजना के तहत परिवार के सदस्यों की सूची में दर्ज नहीं है।

जस्टिस प्रकाश पाडिया और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि यदि बहन मृतक की कानूनी वारिस है तो वह बीमा राशि की हकदार हो सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि परिवार के सदस्यों की सूची और कानूनी वारिस की पात्रता दो अलग-अलग विषय हैं।

उम्र अधिक होने का मतलब यह नहीं कि गृहिणी का परिवार में योगदान खत्म हो जाता है: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजे से जुड़े मामले में कहा कि अधिक उम्र होने के आधार पर किसी गृहिणी के घरेलू योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि गृहिणियां बिना वेतन के घर के कामकाज, बच्चों और पोते-पोतियों की देखभाल सहित परिवार के लिए महत्वपूर्ण सेवाएं देती हैं।

उम्र बढ़ने के साथ उनका यह योगदान समाप्त नहीं हो जाता। इसलिए दुर्घटना मुआवजे की गणना में उनके घरेलू कार्यों और सेवाओं के आर्थिक मूल्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

बालिग अविवाहित बेटी CrPC की धारा 125 के तहत भी मांग सकती है भरण-पोषण: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम (HAMA) के तहत वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध होने के बावजूद बालिग अविवाहित बेटी CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा कर सकती है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर बेटी को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसके पास HAMA की धारा 20(3) के तहत दूसरा कानूनी विकल्प मौजूद है।

POCSO पीड़िताओं को आर्थिक सहायता के लिए इंजरी रिपोर्ट अनिवार्य करने की शर्त असंवैधानिक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष योजना-2015 के तहत यौन अपराध की पीड़ित बच्चियों को आर्थिक सहायता देने के लिए पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट दर्शाने वाली इंजरी रिपोर्ट अनिवार्य करने की शर्त को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि ऐसी शर्त मनमानी है और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है। कई परिस्थितियों में पीड़िता के पास ऐसी मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध नहीं हो सकती। केवल रिपोर्ट के अभाव में उसे आर्थिक सहायता से वंचित करना उचित नहीं है।

बच्चे की कस्टडी का मामला उसी कोर्ट में चलेगा जहां वह रहता है: गुजरात हाईकोर्ट

गुजरात हाईकोर्ट ने गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट के तहत बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामलों में क्षेत्राधिकार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की कस्टडी से संबंधित कार्यवाही उसी फैमिली कोर्ट में होनी चाहिए, जिसके क्षेत्राधिकार में बच्चा सामान्य रूप से रहता है।

अदालत एक अलग रह रही पत्नी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने पति की ओर से दायर वैवाहिक मामले को हिम्मतनगर से राजकोट फैमिली कोर्ट स्थानांतरित करने की मांग की थी। महिला वर्तमान में अपने माता-पिता के साथ राजकोट में रह रही है।