गजब: सरकारी सिस्टम पर सवाल! मसूरी में फिजूलखर्ची के आरोप तो लालढांग में दांत गायब

सरकारी सिस्टम पर सवाल! मसूरी में फिजूलखर्ची के आरोप तो लालढांग में दांत गायब

देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाले दो मामले सामने आए हैं। मसूरी में जहां मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) के रेलिंग निर्माण कार्य को लेकर सरकारी धन के दुरुपयोग के आरोप लग रहे हैं।

वहीं लैंसडाउन वन प्रभाग की लालढांग रेंज के स्टोर से हाथी के दांत गायब होने का मामला वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है। दोनों ही मामलों में विभागीय कार्यप्रणाली, जवाबदेही और सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

मसूरी में क्रैश बैरियर के पास लगाई जा रही रेलिंग, सरकारी धन के दुरुपयोग का आरोप

पहला मामला पहाड़ों की रानी मसूरी का है, जहां बड़ी मूर्ति से पिक्चर पैलेस तक सड़क किनारे एमडीडीए की ओर से रेलिंग लगाने का काम किया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि कई स्थानों पर लोक निर्माण विभाग पहले से ही क्रैश बैरियर लगा चुका है।

इसके बावजूद उन्हीं बैरियरों के बिल्कुल नजदीक नई रेलिंग लगाई जा रही है। स्थानीय लोगों ने इस पर सवाल उठाते हुए सरकारी धन के अनावश्यक इस्तेमाल का आरोप लगाया है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, कुछ स्थानों पर पहले से लगे क्रैश बैरियर से महज आधा फीट की दूरी पर रेलिंग लगाई जा रही है। ऐसे में निर्माण की उपयोगिता और जरूरत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

लोगों का कहना है कि यदि सड़क सुरक्षा मजबूत करना उद्देश्य है तो रेलिंग उन संवेदनशील स्थानों पर लगाई जानी चाहिए, जहां अब तक कोई सुरक्षा इंतजाम नहीं है।

300 मीटर का प्रस्ताव बढ़कर दो किलोमीटर कैसे पहुंचा?

स्थानीय जनप्रतिनिधि एवं सामाजिक कार्यकर्ता गौरव गुप्ता ने बताया कि कुछ महीने पहले उनके क्षेत्र में रेलिंग नहीं होने के कारण एक कार नीचे गिर गई थी। इसके बाद उन्होंने संबंधित स्थान पर रेलिंग लगाने का प्रस्ताव दिया था।

शुरुआत में करीब 300 मीटर रेलिंग लगाने की बात थी, लेकिन बाद में प्रस्ताव बढ़ाकर लगभग दो किलोमीटर कर दिया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर प्रस्ताव की लंबाई बढ़ाने का आधार क्या रहा और क्या अधिकारियों ने मौके पर जाकर वास्तविक जरूरत का आकलन किया था?

वहीं सभासद सचिन गुहेर ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता और तकनीकी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि सड़क किनारे पहले से बने कंक्रीट के हिस्सों को तोड़कर उनमें रेलिंग फिट की जा रही है।

उन्होंने रेलिंग निर्माण के प्रस्ताव, तकनीकी स्वीकृति और बजट की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। साथ ही अनियमितता सामने आने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और नियमानुसार धनराशि की वसूली की मांग भी उठाई है।

मामले में एसडीएम मसूरी राहुल आनंद ने बताया कि बड़ी मूर्ति से पिक्चर पैलेस तक एमडीडीए की ओर से लगाई जा रही रेलिंग को लेकर अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है। यदि कार्य निर्धारित मानकों के विपरीत पाया जाता है तो इसे तत्काल प्रभाव से रुकवाया जाएगा।

लालढांग रेंज के स्टोर से हाथी के दांत गायब, मुख्यालय के पास भी पूरी जानकारी नहीं

दूसरा मामला लैंसडाउन वन प्रभाग की लालढांग रेंज का है, जहां स्टोर में रखे हाथी के दांत गायब होने का मामला सामने आया है। वन्यजीवों के संरक्षण और उनकी तस्करी रोकने की जिम्मेदारी संभालने वाले विभाग के अपने ही स्टोर से हाथी के दांत गायब होने की घटना ने निगरानी व्यवस्था की पोल खोल दी है।

हैरानी की बात यह है कि मामला सामने आने के कई दिन बाद भी वन मुख्यालय यह स्पष्ट नहीं कर पाया है कि आखिर कितने हाथी दांत गायब हुए हैं और उनका कुल वजन कितना था। यह स्थिति तब है, जब विभाग की ओर से पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई जा चुकी है और मामले की जांच के लिए कमेटी भी गठित की गई है।

दरअसल, वन विभाग के स्टोर में विभिन्न मामलों में जब्त वन्यजीवों के अवशेष सुरक्षित रखे जाते हैं। कुछ मामले न्यायालय में विचाराधीन होने के कारण इन अवशेषों को लंबे समय तक संभालकर रखना पड़ता है।

इसी क्रम में प्रदेशभर के वन प्रभागों में हाथी दांतों का सत्यापन कराया गया था। इसी दौरान लालढांग रेंज के स्टोर में रिकॉर्ड और वास्तविक उपलब्धता के बीच अंतर सामने आया।

जांच कमेटी गठित, एफआईआर और कारण बताओ नोटिस जारी

मामले की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग ने जांच कमेटी गठित की है। यमकेश्वर थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई है, जबकि संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस भी जारी किए गए हैं।

प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक नीना ग्रेवाल ने भी स्वीकार किया है कि अभी गायब हाथी दांतों की संख्या और उनके वजन का पता लगाया जा रहा है। उनके मुताबिक, प्रदेशभर में हाथी दांतों के सत्यापन के निर्देश दिए गए थे, जिसके बाद लालढांग रेंज में दांत गायब होने की जानकारी सामने आई।

हालांकि, मामला सामने आने के कई दिन बाद भी मुख्यालय स्तर पर पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं होना विभागीय निगरानी और रिकॉर्ड प्रबंधन पर सवाल खड़े कर रहा है।

प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव खुद अभी मौके पर नहीं पहुंच पाई हैं। उनके पास उत्तराखंड वन विकास निगम के प्रबंध निदेशक की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी है। ऐसे में दो महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी एक ही अधिकारी के पास होने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

दोनों मामलों में जवाबदेही और पारदर्शिता पर सवाल

मसूरी में पहले से मौजूद क्रैश बैरियर के पास रेलिंग लगाने और लालढांग रेंज के स्टोर से हाथी दांत गायब होने के मामले भले ही अलग-अलग विभागों से जुड़े हों, लेकिन दोनों सरकारी व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

एक तरफ विकास कार्यों में जरूरत, बजट और तकनीकी मानकों के पालन की पारदर्शिता पर सवाल हैं, तो दूसरी तरफ वन्यजीवों के महत्वपूर्ण अवशेषों की सुरक्षा और उनके रिकॉर्ड को लेकर विभाग की कार्यप्रणाली कठघरे में है।

अब देखना होगा कि दोनों मामलों की जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई होती है या नहीं।