बाल निकेतनों में बच्चों की सुरक्षा पर हाईकोर्ट सख्त, पैरा लीगल कार्यकर्ताओं की रिपोर्ट तलब
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य में संचालित सरकारी और गैर सरकारी चाइल्ड केयर संस्थानों, बाल निकेतन केंद्रों और दिव्यांग केंद्रों में बच्चों एवं दिव्यांगजनों के उत्पीड़न से जुड़े मामले में सख्त रुख अपनाया है।
मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने सभी जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के पैरा लीगल कार्यकर्ताओं की ओर से तैयार की गई रिपोर्ट याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं, ताकि याचिकाकर्ता रिपोर्ट का अध्ययन कर अपने सुझाव न्यायालय के समक्ष रख सके।
यह मामला गौलापार स्थित नैब केंद्र में एक दिव्यांग बच्ची के साथ कथित यौन उत्पीड़न समेत अन्य शिकायतों के आधार पर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से हाईकोर्ट के संज्ञान में लाया गया था।
शिकायतों के बाद हुई जांच में प्रदेश के विभिन्न बाल निकेतनों, चाइल्ड केयर सेंटरों और दिव्यांग केंद्रों के संचालन में निर्धारित मानकों के अनुपालन को लेकर गंभीर कमियां सामने आई थीं।
याचिका में मांग की गई है कि इन संस्थानों में बच्चों और दिव्यांगजनों की सुरक्षा तथा बेहतर देखभाल सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित मानकों को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए।
इसके साथ ही दिव्यांग बच्चों और अन्य विशेष जरूरत वाले बच्चों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षित काउंसलरों की नियुक्ति समेत आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
हर जिले में केंद्रों का निरीक्षण होगा
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने राज्य के सभी जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को निर्देश दिया है कि वे अपने अधीन कार्यरत पैरा लीगल कार्यकर्ताओं के माध्यम से संबंधित चाइल्ड केयर सेंटरों का दौरा कराएं।
निरीक्षण के दौरान केंद्रों में बच्चों की सुरक्षा, सुविधाओं, देखभाल, स्टाफ व्यवस्था और निर्धारित मानकों के अनुपालन की स्थिति का आकलन किया जाएगा।
पैरा लीगल कार्यकर्ताओं को इन केंद्रों का निरीक्षण करने के बाद विस्तृत रिपोर्ट तैयार करनी होगी, जिसे न्यायालय के समक्ष पेश किया जाएगा। हाईकोर्ट के इस निर्देश से प्रदेशभर में संचालित बाल देखभाल और दिव्यांग केंद्रों की व्यवस्थाओं की व्यापक निगरानी का रास्ता साफ हुआ है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों से प्राप्त रिपोर्ट याचिकाकर्ता को दी जाएगी। रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ता अपने सुझाव न्यायालय के समक्ष रख सकेगा, जिसके बाद मामले में आगे की सुनवाई होगी।


