उत्तराखंड पुलिस में ST प्रमाणपत्रों पर सवाल, उच्चस्तरीय जांच की मांग
देहरादून। उत्तराखंड पुलिस में अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण के आधार पर हुई नियुक्तियों और पदोन्नतियों को लेकर नया विवाद सामने आया है।
अधिवक्ता एवं सामाजिक/आरटीआई कार्यकर्ता विकेश सिंह नेगी ने गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक और पुलिस मुख्यालय के अपर पुलिस अधीक्षक (कार्मिक) को शिकायत भेजकर संदिग्ध अनुसूचित जनजाति प्रमाण-पत्रों के आधार पर हुई नियुक्तियों की स्वतंत्र एवं उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
नेगी का कहना है कि प्रदेश में हजारों शिक्षित बेरोजगार युवा वर्षों से सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में यदि किसी अपात्र व्यक्ति ने गलत या संदिग्ध जाति प्रमाण-पत्र के आधार पर आरक्षित पद हासिल किया है तो यह वास्तविक अनुसूचित जनजाति अभ्यर्थियों और बेरोजगार युवाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
शिकायत में कहा गया है कि यह मामला किसी व्यक्ति की निजी पहचान का नहीं, बल्कि सार्वजनिक नियुक्तियों की वैधानिकता, आरक्षण व्यवस्था की पारदर्शिता और सरकारी धन के उचित उपयोग का है।
उन्होंने आरोप लगाया कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी को संबंधित अधिकारियों की असहमति का हवाला देकर व्यक्तिगत सूचना बताते हुए उपलब्ध नहीं कराया गया, जबकि ऐसे मामलों में प्रमाण-पत्रों का स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है।
विकेश सिंह नेगी ने संविधान के अनुच्छेद 342 और सर्वोच्च न्यायालय के State of Maharashtra v. Milind (2000) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित अनुसूचित जनजातियों की सूची से बाहर किसी जाति, उपजाति या स्थानीय नाम के आधार पर आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। यदि ऐसे मामलों में प्रमाण-पत्र जारी हुए हैं तो उनकी विधिसम्मत जांच होनी चाहिए।
शिकायत में गृह, कार्मिक, समाज कल्याण, राजस्व विभाग और पुलिस मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों की संयुक्त उच्चस्तरीय समिति गठित करने की मांग की गई है। साथ ही सभी प्रमाण-पत्रों का मूल तहसील एवं जिला अभिलेखों से सत्यापन, नियुक्ति के समय किए गए सत्यापन की जांच और जांच पूरी होने तक संबंधित सेवा अभिलेखों को सुरक्षित रखने की भी मांग की गई है।
नेगी ने कहा कि यदि किसी मामले में प्रमाण-पत्र जाली, गलत या अधिकार क्षेत्र से बाहर जारी पाया जाता है तो संबंधित कर्मचारी के साथ-साथ प्रमाण-पत्र जारी करने और सत्यापन में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह शिकायत किसी समुदाय या वास्तविक अनुसूचित जनजाति के पात्र अभ्यर्थियों के खिलाफ नहीं है, बल्कि आरक्षण व्यवस्था के दुरुपयोग को रोकने, वास्तविक पात्रों के अधिकारों की रक्षा करने और सरकारी नियुक्तियों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई है।


