दुष्कर्म दोषी की सजा में राहत, भूमि आवंटन याचिका निस्तारित, तथ्य छिपाने पर 50 हजार जुर्माना
- 10 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म के दोषी की सजा 12 से 10 साल हुई, पथरी वन भूमि आवंटन मामले में डीएम को प्रत्यावेदन का निर्देश, अग्रिम जमानत याचिका में तथ्य छिपाने पर कोर्ट सख्त
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गुरुवार को तीन अलग-अलग मामलों में महत्वपूर्ण आदेश सुनाए। एक ओर 10 वर्षीय नाबालिग से दुष्कर्म के दोषी की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उसकी सजा 12 वर्ष से घटाकर 10 वर्ष कर दी गई।
वहीं मुजफ्फरनगर के बाढ़ प्रभावित परिवारों को पथरी वन क्षेत्र में भूमि आवंटन की मांग संबंधी याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ताओं को हरिद्वार जिलाधिकारी के समक्ष नया प्रत्यावेदन देने की छूट दी गई।
इसके अलावा न्यायालय ने पूर्व में दाखिल याचिका की जानकारी छिपाकर अग्रिम जमानत मांगने वाले एक आवेदक पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
दुष्कर्म मामले में न्यायमूर्ति रवींद्र मैठानी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ शाह की खंडपीठ ने वर्ष 2017 के पॉक्सो मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि पीड़िता और उसके प्रत्यक्षदर्शी भाई के बयान विश्वसनीय एवं अकाट्य हैं।
अदालत ने एफआईआर में देरी और एफएसएल रिपोर्ट को लेकर उठाए गए तर्कों को पर्याप्त नहीं माना तथा निचली अदालत द्वारा दर्ज दोषसिद्धि को सही ठहराया।
हालांकि यह देखते हुए कि दोषी नौ वर्ष से अधिक समय जेल में बिता चुका है, उसकी सजा 12 वर्ष से घटाकर 10 वर्ष कर दी गई।
दूसरे मामले में न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने मुजफ्फरनगर के बाढ़ प्रभावित परिवारों की याचिका का निस्तारण करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता तीन सप्ताह के भीतर हरिद्वार जिलाधिकारी के समक्ष नया प्रत्यावेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।
अदालत ने निर्देश दिया कि जिलाधिकारी कानून के अनुसार अधिकतम नौ माह के भीतर इस पर निर्णय लें। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि 1952 में पथरी वन क्षेत्र की डी-नोटिफाइड भूमि उन्हें आवंटित किए जाने का प्रस्ताव था, लेकिन आज तक उन्हें उसका लाभ नहीं मिला।
वहीं, न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ ने हरिद्वार निवासी समीर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने पाया कि आवेदक ने पूर्व में दाखिल आपराधिक रिट याचिका और उसमें पारित आदेश की जानकारी छिपाकर अग्रिम जमानत की मांग की थी।
न्यायालय ने इसे अदालत को गुमराह करने का प्रयास मानते हुए 50 हजार रुपये का अनुकरणीय जुर्माना लगाया और राशि चार सप्ताह के भीतर उत्तराखंड हाईकोर्ट बार एसोसिएशन में जमा कराने के निर्देश दिए। राशि जमा न होने पर इसे भू-राजस्व की बकाया राशि की तरह वसूलने को कहा गया।


