फर्जी दस्तावेज, रद्द दाखिले और बढ़ती जांच! MBBS प्रवेश मामले में नया खुलासा
देहरादून। उत्तराखंड में एमबीबीएस दाखिलों के लिए राज्य कोटे के तहत लगाए गए प्रमाणपत्रों की जांच के बीच नए सवाल खड़े हो गए हैं।
फर्जी और संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर मेडिकल सीट हासिल करने के आरोपों की जांच आगे बढ़ने के साथ ही प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया, उनके सत्यापन और राज्य कोटे में पात्रता को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
अब तक जांच के आधार पर 19 अभ्यर्थियों के सीट आवंटन निरस्त किए जा चुके हैं, जबकि 778 से अधिक प्रमाणपत्रों की जांच जारी है।
इस बीच सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप बहुगुणा ने हरिद्वार मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने वाले दो अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति गठित करने की मांग की है।
एक प्रमाणपत्र संख्या पर दो नाम का दावा
प्रदीप बहुगुणा का दावा है कि हरिद्वार मेडिकल कॉलेज में राज्य कोटे के तहत एमबीबीएस सीट पाने वाले एक अभ्यर्थी के स्थायी निवास प्रमाणपत्र की ऑनलाइन जांच के दौरान उसी प्रमाणपत्र संख्या पर ऊखीमठ की एक युवती का रिकॉर्ड सामने आया।
उनका कहना है कि एक ही प्रमाणपत्र संख्या का अलग-अलग नामों से जुड़े दस्तावेजों में दिखाई देना गंभीर मामला है और इसकी जांच केवल ऑनलाइन रिकॉर्ड नहीं, बल्कि मूल सरकारी अभिलेखों के आधार पर होनी चाहिए।
हालांकि इस दावे की पुष्टि संबंधित विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट के बाद ही हो सकेगी।
सीट आवंटन से पहले जारी नहीं हुआ था प्रमाणपत्र?
बहुगुणा ने एक अन्य मामले में उत्तर प्रदेश के एक अभ्यर्थी को ओबीसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के तहत एमबीबीएस सीट आवंटित किए जाने पर सवाल उठाया है।
उनका आरोप है कि अभ्यर्थी ने चमोली जिले के नारायणबगड़ में संबंधित प्रमाणपत्र के लिए सितंबर में आवेदन किया था, जबकि सीट आवंटन उससे पहले हो चुका था।
उन्होंने आवेदन, प्रमाणपत्र जारी होने और सीट आवंटन की तारीखों का मिलान कर पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है।
SIT की जांच के दायरे पर भी उठे सवाल
प्रदीप बहुगुणा ने जांच कर रही एसआईटी के दायरे को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि उन्होंने करीब 370 अभ्यर्थियों की सूची चिकित्सा शिक्षा मंत्री को सौंपकर राज्य कोटे में हुए दाखिलों और संबंधित दस्तावेजों की जांच की मांग की थी, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
उनका आरोप है कि जिलों को दस्तावेजों की सूची डाक से भेजे जाने के कारण जांच प्रक्रिया धीमी हो सकती है। साथ ही उन्होंने आशंका जताई कि यदि मामला सीबीसीआईडी को सौंपा जाता है तो जांच और लंबी खिंच सकती है।
राज्य कोटे की पात्रता पर भी बहस
मामले के बीच राज्य कोटे की पात्रता को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। मौजूदा नियमों के अनुसार उत्तराखंड से 10वीं और 12वीं की पढ़ाई करने वाला अभ्यर्थी स्थायी निवास प्रमाणपत्र के बिना भी राज्य कोटे की काउंसलिंग में भाग ले सकता है, हालांकि उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।
बहुगुणा ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए ऐसे अभ्यर्थियों के शैक्षिक प्रमाणपत्रों की भी जांच की मांग की है।
विश्वविद्यालय ने दिया नियमों का हवाला
हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि उत्तराखंड से हाईस्कूल और इंटरमीडिएट उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को राज्य कोटे की काउंसलिंग में शामिल होने की अनुमति शासनादेश के तहत दी गई है।
विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक प्रो. विजय जुयाल के अनुसार प्रथम और द्वितीय चरण में प्रवेशित तथा फ्लोट किए गए सभी अभ्यर्थियों के मूल अभिलेख संबंधित जिलों को ईमेल और डाक के माध्यम से सत्यापन के लिए भेजे गए हैं। जिलों से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर अब तक 19 सीट आवंटन निरस्त किए जा चुके हैं।
उन्होंने कहा कि सीट आवंटन किसी एक अधिकारी द्वारा नहीं, बल्कि 15 से अधिक सदस्यों वाले काउंसलिंग बोर्ड द्वारा किया जाता है। ऑनलाइन आवेदन में अभ्यर्थियों द्वारा प्रस्तुत दावों के आधार पर सीट आवंटित होती है, जबकि बाद में संस्थान और जिला प्रशासन दस्तावेजों का सत्यापन करते हैं।
सरकार का रुख सख्त
चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल ने साफ किया है कि जांच में किसी भी अभ्यर्थी या प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया से जुड़े व्यक्ति की भूमिका सामने आने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
सरकार ने दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया को और मजबूत करने के निर्देश दिए हैं ताकि भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति न हो।
आगे क्या?
फर्जी प्रमाणपत्रों के कुछ मामलों में एफआईआर दर्ज होने के साथ गिरफ्तारियां भी हो चुकी हैं। वहीं, प्रमाणपत्र जारी करने वाले स्तर पर भी जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया जारी है।
19 सीटों के निरस्तीकरण और 778 से अधिक प्रमाणपत्रों की जांच के बीच अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट पर टिकी है, जो यह तय करेगी कि यह मामला केवल कुछ अभ्यर्थियों तक सीमित है या फिर मेडिकल प्रवेश व्यवस्था में कहीं बड़ी खामियां मौजूद हैं।




