बिग ब्रेकिंग: लॉ ऑफिसर भर्ती विवाद में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, दोनों उम्मीदवारों को नौकरी देने के आदेश

बिग ब्रेकिंग: लॉ ऑफिसर भर्ती विवाद में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, दोनों उम्मीदवारों को नौकरी देने के आदेश

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने लॉ ऑफिसर भर्ती परीक्षा से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा और संतुलित फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी प्रश्न का उत्तर कानूनी रूप से अस्पष्ट और बहु-व्याख्यात्मक हो,

तो उम्मीदवारों को नुकसान नहीं उठाना चाहिए। इसी आधार पर कोर्ट ने दोनों दावेदारों को राहत देते हुए उन्हें नौकरी देने के निर्देश दिए हैं।

यह मामला चंडीगढ़ नगर निगम द्वारा वर्ष 2021 में आयोजित लॉ ऑफिसर भर्ती परीक्षा से जुड़ा है, जिसमें चरण प्रीत सिंह का चयन हुआ था। इस चयन को दूसरे उम्मीदवार अमित कुमार शर्मा ने चुनौती दी थी।

शर्मा का कहना था कि एक संवैधानिक सवाल में उन्होंने “उपरोक्त में से कोई नहीं” विकल्प चुना था, लेकिन आधिकारिक उत्तर “नौवीं अनुसूची” मानते हुए उन्हें नेगेटिव मार्किंग दी गई, जिससे उनका चयन प्रभावित हुआ।

विवादित प्रश्न यह था कि “संविधान की कौन सी अनुसूची मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा से मुक्त है” भर्ती प्राधिकरण ने इसका सही उत्तर नौवीं अनुसूची माना,

लेकिन शर्मा ने तर्क दिया कि I.R. Coelho बनाम तमिलनाडु राज्य के फैसले के बाद कोई भी अनुसूची पूर्ण रूप से न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं है, इसलिए “कोई नहीं” विकल्प अधिक सही है।

मामला पहले हाईकोर्ट पहुंचा, जहां सिंगल बेंच ने पारंपरिक व्याख्या के आधार पर नौवीं अनुसूची को सही ठहराया। हालांकि, डिवीजन बेंच ने अलग दृष्टिकोण अपनाते हुए माना कि नौवीं अनुसूची भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।

और यदि कोई कानून संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता है, तो उसकी न्यायिक समीक्षा हो सकती है। इस आधार पर शर्मा के उत्तर को भी सही मान लिया गया।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और संवैधानिक व्याख्याओं को देखते हुए कहा कि यह प्रश्न अत्यंत जटिल था और इसके एक से अधिक उत्तर संभव हैं।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब न्यायाधीशों के बीच ही इस मुद्दे पर मतभेद है, तो प्रतियोगी परीक्षा में बैठे अभ्यर्थियों से एकमात्र सही उत्तर की अपेक्षा करना उचित नहीं है।

इसी निष्पक्ष दृष्टिकोण को अपनाते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि दोनों उम्मीदवारों को नियुक्त किया जाए। इसके लिए नगर निगम एक अतिरिक्त पद (Supernumerary Post) सृजित करे।

साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि पहले से नियुक्त उम्मीदवार की नौकरी और वरिष्ठता दोनों सुरक्षित रहेंगी। यह फैसला प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।