विरासत में राहुल देशपांडे की गायकी का जादू, शास्त्रीय सुरों में डूबे संगीत प्रेमी
देहरादून। विरासत महोत्सव के भव्य मंच पर प्रख्यात शास्त्रीय गायक राहुल देशपांडे की सुरमयी प्रस्तुति ने संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
अपनी ओजस्वी आवाज, गायकी की विशिष्ट शैली और शास्त्रीय संगीत की गहरी समझ से राहुल देशपांडे ने ऐसी समां बांधी कि दर्शक देर तक संगीत के सुरों में डूबे रहे। उनकी प्रस्तुति ने विरासत की सांस्कृतिक संध्या को यादगार बना दिया।
राहुल देशपांडे की इस शानदार प्रस्तुति में तबले पर शुभ महाराज, हारमोनियम पर पंडित धर्मनाथ मिश्रा तथा तानपुरे पर परीक्षित सिंह राठौड़ और सृष्टि कला ने प्रभावशाली संगत की। कलाकारों के बीच शानदार तालमेल और सुरों की जुगलबंदी ने कार्यक्रम की खूबसूरती को और बढ़ा दिया।
राहुल देशपांडे भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा से जुड़े प्रतिष्ठित परिवार से आते हैं। वह प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक स्वर्गीय पंडित वसंतराव देशपांडे के पौत्र हैं। उनकी गायकी पर पंडित कुमार गंधर्व के संगीत का विशेष प्रभाव रहा है।
उषाताई चिपलकट्टी और पंडित कुमार गंधर्व के पुत्र मुकुल शिवपुत्र ने उनके शुरुआती संगीत सफर में मार्गदर्शन किया। इसके अलावा उन्होंने पंडित गंगाधरभुवा पिंपलखारे और डॉ. मधुसूदन पटवर्धन से संगीत की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने पंडित सुरेश सामंत से तबला वादन भी सीखा।
राहुल देशपांडे की गायकी की खासियत यह है कि इसमें शास्त्रीय रागों के साथ ख्याल, ठुमरी, दादरा, नाट्यगीत, भजन, गजल और भावगीत जैसी विविध संगीत शैलियों का समावेश देखने को मिलता है।
वह किसी एक घराने तक सीमित रहने के बजाय विभिन्न घरानों की उत्कृष्ट गायन परंपराओं को आत्मसात करने के पक्षधर हैं। उनकी गायकी में पंडित कुमार गंधर्व की निर्गुणी संगीत परंपरा की झलक भी दिखाई देती है।
राहुल देशपांडे ने केवल शास्त्रीय गायन तक अपनी प्रतिभा सीमित नहीं रखी, बल्कि मराठी संगीत नाटक की समृद्ध परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उन्होंने ‘कट्यार कलजात घुसली’, ‘संगीत मान अपमान’ और ‘संशय कल्लोल’ जैसे प्रतिष्ठित मराठी नाटकों के निर्माण और प्रस्तुतियों के माध्यम से इस परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया।
‘कट्यार कलजात घुसली’ पर बनी फिल्म और उसके संगीत ने युवा पीढ़ी के बीच शास्त्रीय संगीत के प्रति आकर्षण बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
युवा और उभरते कलाकारों को मंच प्रदान करने के उद्देश्य से उन्होंने ‘स्वराउन्मेश’ की शुरुआत की। इसके अलावा वह कई टेलीविजन रियलिटी शो में निर्णायक की भूमिका निभा चुके हैं।
फिल्म ‘मी वसंतराव’ में उन्होंने मुख्य अभिनेता के रूप में अभिनय करने के साथ ही फिल्म का संगीत भी तैयार किया। यह फिल्म उनके दादा और महान शास्त्रीय गायक पंडित वसंतराव देशपांडे के जीवन पर आधारित है।
राहुल देशपांडे को उनके संगीत योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। इनमें राष्ट्रीय पुरस्कार, रसिकाग्रणी दत्तोपंत देशपांडे पुरस्कार और सुधीर फड़के पुरस्कार प्रमुख हैं। उन्होंने देश-विदेश में अनेक प्रस्तुतियां दी हैं और शास्त्रीय एवं अर्धशास्त्रीय संगीत की कई रिकॉर्डिंग भी जारी की हैं।
विरासत महोत्सव में उनकी प्रस्तुति ने एक बार फिर साबित किया कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा आज भी नई पीढ़ी को आकर्षित करने की क्षमता रखती है।
राहुल देशपांडे ने अपनी गायकी के माध्यम से न केवल संगीत प्रेमियों का दिल जीता, बल्कि भारतीय संगीत विरासत की खूबसूरती और उसकी निरंतरता का भी शानदार परिचय दिया।



