बिग ब्रेकिंग: 45 लाख में MBBS सीट, 20 लाख एडवांस! फर्जी प्रमाणपत्र के खेल में दो गिरफ्तार

45 लाख में MBBS सीट, 20 लाख एडवांस! फर्जी प्रमाणपत्र के खेल में दो गिरफ्तार

देहरादून। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के सहारे एमबीबीएस में दाखिला दिलाने के मामले में देहरादून पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है।

पुलिस जांच में सामने आया है कि कथित तौर पर तीन अभ्यर्थियों को एमबीबीएस सीट दिलाने के लिए करीब 45-45 लाख रुपये में सौदा तय किया गया था।

परिजनों से करीब 20-20 लाख रुपये एडवांस लेने और दाखिला व कक्षाएं शुरू होने के बाद शेष रकम लेने की बात सामने आई है।

पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों में बिहार के पूर्णिया निवासी और वर्तमान में मेरठ में रहने वाला रूपेश पंडित तथा हरिद्वार के लक्सर निवासी अरविंद कुमार शामिल हैं।

पुलिस का कहना है कि रूपेश पिछले करीब पांच वर्षों से एजुकेशन कंसल्टेंसी का काम कर रहा था और मेरठ में मेकोडो नाम से कंपनी संचालित करता था।

वह विभिन्न विश्वविद्यालयों और विदेशों में एमबीबीएस, बीटेक, बीडीएस समेत अन्य पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिलाने के लिए कमीशन पर काम करता था।
जांच में पुलिस को पता चला कि अरविंद रूपेश का पुराना परिचित है और उसने अपनी बेटी परी के दाखिले के लिए उससे संपर्क किया था।

पुलिस के मुताबिक, इसी नेटवर्क के जरिए अभ्यर्थियों के कथित फर्जी दस्तावेज तैयार कराए गए और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र हासिल करने की कोशिश की गई।

चार अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में एक ही स्वतंत्रता सेनानी का नाम

मामले की शुरुआत चार छात्राओं तृप्ति, स्वाति, खुशी और परी के दस्तावेजों की जांच से हुई। चारों के आवेदन में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धर्मवीर वर्मा पुत्र खजान सिंह के नाम का कथित परिचय पत्र लगाया गया था।

प्रशासनिक जांच में संबंधित सरकारी पंजिका में धर्मवीर वर्मा के नाम का रिकॉर्ड नहीं मिला।
जांच के दौरान चारों अभ्यर्थियों के पते और मोबाइल नंबरों में भी विसंगतियां सामने आईं।

तृप्ति के आवेदन में मोथरोवाला का पता दर्ज था, लेकिन मौके पर उसके या उसके परिवार के वहां रहने की पुष्टि नहीं हुई। वहीं स्वाति, खुशी और परी के आवेदन में राजीव नगर, तरली कंडोली का पता दर्ज था। स्थलीय सत्यापन में इन पते पर भी संबंधित अभ्यर्थियों अथवा उनके परिवार के रहने की पुष्टि नहीं हुई।

पुलिस के मुताबिक, कई मोबाइल नंबर भी संबंधित अभ्यर्थियों के बजाय दूसरे लोगों के पाए गए।
जरूरी दस्तावेजों की जगह लगाए गए दूसरे कागज
जांच में ऑनलाइन आवेदन के साथ लगाए गए दस्तावेजों की भी पड़ताल की गई।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र के लिए जरूरी दस्तावेजों में निवास प्रमाणपत्र, पेंशन पट्टा और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का कार्ड शामिल थे। लेकिन चारों आवेदनों में ये दस्तावेज उपलब्ध नहीं मिले।

इनकी जगह अभ्यर्थियों और उनके माता-पिता के आधार कार्ड लगाए गए थे। राजस्व अधिकारियों के स्थलीय सत्यापन में आधार में दर्ज पतों पर भी संबंधित लोगों के रहने की पुष्टि नहीं हुई। कुछ शपथपत्रों में भी नाम और पारिवारिक विवरण को लेकर विसंगतियां सामने आईं।

प्रशासन ने चारों प्रमाणपत्र किए निरस्त

तहसीलदार की जांच के बाद चारों प्रमाणपत्रों को संदिग्ध मानते हुए निरस्त करने की संस्तुति की गई। इसके बाद एसडीएम सदर अपूर्वा सिंह ने 10 सितंबर 2026 को चारों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र निरस्त कर दिए।

प्रमाणपत्र निरस्त होने के बाद एचएनबी चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय ने भी चारों एमबीबीएस दाखिले रद्द कर दिए। विश्वविद्यालय की ओर से इन सीटों को रिक्त मानते हुए आगे की काउंसलिंग प्रक्रिया में शामिल करने की बात कही गई।

शिकायत के बाद गठित हुई SIT

एसएसपी प्रमेन्द्र सिंह डोबाल के अनुसार, 13 सितंबर 2026 को राजस्व उपनिरीक्षक कंडोली, सदर देहरादून जगदीश सिंह की शिकायत पर रायपुर थाने में मुकदमा दर्ज किया गया।

शिकायत में सरकारी पोर्टल पर कथित कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए आवेदन किए जाने की बात सामने आई थी।

मामले की गंभीरता को देखते हुए एसपी ग्रामीण जया बलूनी के पर्यवेक्षण में पांच सदस्यीय एसआईटी गठित की गई। टीम ने राजस्व रिकॉर्ड, प्रमाणपत्र जारी करने से जुड़ी पत्रावलियां और मेडिकल कॉलेजों के दाखिला रिकॉर्ड खंगालने शुरू किए।

धर्मवीर वर्मा के परिवार के बयान से बढ़ा सवाल

एसआईटी ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धर्मवीर वर्मा के बेटे मनोज कुमार के बयान भी दर्ज किए। मनोज ने पुलिस को बताया कि उनके परिवार ने अपने पिता के प्रमाणपत्र का इस्तेमाल नहीं किया।

इसके बाद जांच का अहम सवाल यह बन गया कि धर्मवीर वर्मा के नाम का कथित दस्तावेज तैयार किसने किया और वह दस्तावेज अभ्यर्थियों तक कैसे पहुंचा।

एसआईटी ने एसडीएम सदर और एडीएम कार्यालय की पत्रावलियां भी कब्जे में लेकर प्रमाणपत्र जारी करने की पूरी प्रक्रिया की जांच शुरू की है। संबंधित पटवारी से भी पूछताछ की गई है।

अब जांच एजुकेशन कंसल्टेंसी नेटवर्क और पैसों तक
रूपेश पंडित और अरविंद कुमार की गिरफ्तारी के बाद जांच का दायरा फर्जी प्रमाणपत्रों से आगे बढ़कर कथित एजुकेशन कंसल्टेंसी नेटवर्क और पैसों के लेन-देन तक पहुंच गया है।

पुलिस के अनुसार, तीन अभ्यर्थियों के लिए करीब 45-45 लाख रुपये में एमबीबीएस दाखिले की बात तय हुई थी और करीब 20-20 लाख रुपये एडवांस लेने की बात सामने आई है।

अब एसआईटी यह पता लगाने में जुटी है कि फर्जी दस्तावेज तैयार कराने में और कौन लोग शामिल थे, प्रमाणपत्रों के लिए आवेदन किसने किए, सरकारी स्तर पर सत्यापन की प्रक्रिया कैसे हुई और मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के दौरान इन दस्तावेजों को किस स्तर पर स्वीकार किया गया।

पुलिस का कहना है कि जांच में सामने आने वाले साक्ष्यों के आधार पर अन्य संदिग्धों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।