विधायक निधि खर्च में पहाड़ पीछे और मैदान आगे, कांग्रेस विधायकों का औसत भाजपा से अधिक
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले विधायक निधि के इस्तेमाल को लेकर सामने आए आंकड़ों ने विधानसभा क्षेत्रों के विकास और निधि खर्च की रफ्तार पर सवाल खड़े किए हैं।
सूचना के अधिकार (RTI) के तहत ग्राम्य विकास आयुक्त कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार वित्तीय वर्ष 2022-23 से जून 2026 तक प्रदेश के 70 विधायकों के लिए कुल 1,664 करोड़ रुपये की विधायक निधि उपलब्ध हुई।
इसमें से करीब 1,091.29 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके। यानी कुल उपलब्ध निधि का लगभग 66 प्रतिशत खर्च हुआ, जबकि करीब 572.71 करोड़ रुपये खर्च होना बाकी रहे। हालिया रिपोर्टों में भी इसी अवधि के आंकड़ों के आधार पर 34 प्रतिशत निधि के अप्रयुक्त रहने की बात सामने आई है।
पहाड़ी जिलों में विधायक निधि खर्च की रफ्तार सबसे धीमी
आंकड़ों को भौगोलिक आधार पर देखें तो पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों के बीच विधायक निधि खर्च में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत और पिथौरागढ़ के 34 विधानसभा क्षेत्रों के लिए करीब 807.5 करोड़ रुपये की निधि उपलब्ध रही। इनमें से लगभग 501.07 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
इस हिसाब से पहाड़ी विधानसभा क्षेत्रों में प्रति विधायक औसत खर्च करीब 14.74 करोड़ रुपये रहा और कुल खर्च दर लगभग 62 प्रतिशत रही।
इसके मुकाबले हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर के 20 विधानसभा क्षेत्रों में करीब 475 करोड़ रुपये की निधि उपलब्ध हुई, जिसमें लगभग 337.86 करोड़ रुपये खर्च किए गए। यहां प्रति विधायक औसत खर्च करीब 16.88 करोड़ रुपये और खर्च दर लगभग 71.1 प्रतिशत रही।
यानी पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों के बीच प्रति विधायक औसत खर्च में करीब 2.14 करोड़ रुपये का अंतर सामने आया है।
देहरादून और नैनीताल की तस्वीर बीच में
देहरादून और नैनीताल जिलों को अलग श्रेणी में रखने पर इनकी स्थिति पहाड़ और मैदान के बीच दिखाई देती है। दोनों जिलों की 16 विधानसभा सीटों के लिए करीब 380 करोड़ रुपये की निधि उपलब्ध रही, जिसमें लगभग 252.36 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
इन विधानसभा क्षेत्रों में प्रति विधायक औसत खर्च करीब 15.77 करोड़ रुपये और कुल खर्च दर लगभग 66.4 प्रतिशत रही।
इस तरह भौगोलिक आधार पर विधायक निधि खर्च की तस्वीर देखें तो पहाड़ी जिले करीब 62 प्रतिशत, देहरादून-नैनीताल के मिश्रित क्षेत्र करीब 66.4 प्रतिशत और मैदानी जिले करीब 71.1 प्रतिशत खर्च दर पर रहे।
हालांकि केवल इन आंकड़ों के आधार पर कम खर्च के कारण तय नहीं किए जा सकते। पहाड़ी क्षेत्रों में भौगोलिक परिस्थितियां, निर्माण स्थलों तक पहुंच, प्रशासनिक प्रक्रिया और परियोजनाओं की प्रकृति जैसे कई कारक निधि खर्च की रफ्तार को प्रभावित कर सकते हैं।
विधायक निधि खर्च में कांग्रेस का औसत भाजपा से आगे
राजनीतिक दलों के आधार पर विधायकवार दर्ज खर्च प्रतिशत का औसत निकाला जाए तो कांग्रेस विधायक करीब 68.4 प्रतिशत और भाजपा विधायक करीब 64.4 प्रतिशत पर दिखाई देते हैं। यानी विधायकवार प्रतिशत के साधारण औसत में कांग्रेस विधायकों का आंकड़ा भाजपा विधायकों से करीब 4 प्रतिशत अंक अधिक है।
हालांकि यह तुलना विधायकवार प्रतिशतों के साधारण औसत पर आधारित है। इसे दोनों दलों की कुल निधि की भारित व्यय दर नहीं माना जाना चाहिए। साथ ही अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में उपलब्ध निधि और खर्च की परिस्थितियां भी अलग हो सकती हैं।
77 प्रतिशत खर्च के साथ कई विधायक आगे
उपलब्ध आंकड़ों में सबसे अधिक दर्ज खर्च 77 प्रतिशत है। इस स्तर पर रुड़की के प्रदीप बत्रा और पिरान कलियर के फुरकान अहमद दर्ज हैं।
इसके बाद 76 प्रतिशत खर्च के स्तर पर रवि बहादुर और काजी निजामुद्दीन हैं। वहीं करीब 75 प्रतिशत खर्च करने वालों में महेश जीना और मदन सिंह बिष्ट सहित कुछ अन्य विधायक शामिल हैं।
इसके अलावा खानपुर के निर्दलीय उमेश कुमार, हल्द्वानी के सुमित हृदयेश और नानकमत्ता के गोपाल सिंह राणा जैसे विधायक भी अपेक्षाकृत अधिक खर्च वाले समूह में दर्ज हैं।
कई विधानसभा क्षेत्रों में खर्च 60 प्रतिशत से भी कम
दूसरी ओर कुछ विधानसभा क्षेत्रों में विधायक निधि खर्च की स्थिति काफी कम रही। टिहरी विधानसभा क्षेत्र में करीब 30 प्रतिशत खर्च दर्ज है, जो उपलब्ध आंकड़ों में सबसे निचले स्तर पर है।
इसके बाद यमकेश्वर में करीब 44 प्रतिशत, चकराता में 51 प्रतिशत, कपकोट में 52 प्रतिशत और चंपावत में करीब 53 प्रतिशत खर्च दर्ज किया गया है।
इससे साफ है कि प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों में विधायक निधि खर्च की रफ्तार एक जैसी नहीं है। कुछ क्षेत्रों में उपलब्ध निधि का तीन-चौथाई हिस्सा खर्च हो चुका है, जबकि कुछ क्षेत्रों में आधे से भी कम निधि खर्च हुई है।
मंत्रियों के बीच भी बड़ा अंतर
कैबिनेट मंत्रियों की विधानसभा सीटों में भी विधायक निधि खर्च के आंकड़ों में खासा अंतर दिखाई देता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रदीप बत्रा करीब 77 प्रतिशत खर्च के साथ आगे हैं।
सौरभ बहुगुणा ने करीब 72 प्रतिशत, सतपाल महाराज ने 68 प्रतिशत, खजान दास ने करीब 66 प्रतिशत और गणेश जोशी ने करीब 65 प्रतिशत निधि खर्च की है।
राम सिंह कैड़ा करीब 62 प्रतिशत और रेखा आर्या करीब 60 प्रतिशत खर्च के स्तर पर हैं। वहीं सुबोध उनियाल और भरत सिंह चौधरी करीब 57 प्रतिशत तथा डॉ. धन सिंह रावत करीब 37 प्रतिशत खर्च के साथ 60 प्रतिशत से नीचे हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की चंपावत विधानसभा सीट पर भी उपलब्ध आंकड़ों में करीब 53 प्रतिशत निधि खर्च दर्ज है।
चुनावी साल में आंकड़े क्यों महत्वपूर्ण?
वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल अंतिम दौर में है। ऐसे समय में विधायक निधि के इस्तेमाल के आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि विधायक निधि सीधे विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय विकास कार्यों से जुड़ी होती है।
जून 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक कुल 1,664 करोड़ रुपये में से करीब 1,091 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, जबकि लगभग 573 करोड़ रुपये खर्च होना बाकी है। आने वाले महीनों में इस निधि के इस्तेमाल की रफ्तार बढ़ती है या नहीं, यह अलग से देखने वाला विषय होगा।
वरिष्ठ पत्रकार नीरज कोहली ने जताई चिंता
विधायक निधि के उपयोग को लेकर वरिष्ठ पत्रकार नीरज कोहली ने कहा कि उत्तराखंड में विधायक निधि समय के साथ काफी बढ़ी है, लेकिन उसके अनुपात में इसके प्रभावी उपयोग की क्षमता दिखाई नहीं दे रही है।
उनके मुताबिक वर्ष 2002 में राज्य की पहली निर्वाचित सरकार के समय विधायक निधि करीब 75 लाख रुपये थी, जो अब बढ़कर 5 करोड़ रुपये सालाना हो चुकी है। पांच वर्ष के कार्यकाल में एक विधायक के लिए यह राशि करीब 25 करोड़ रुपये बैठती है।
नीरज कोहली का कहना है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के विधायक अपने क्षेत्रों की जरूरतों का हवाला देकर विधायक निधि बढ़ाने की मांग करते रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर उपलब्ध निधि का पूरा और प्रभावी इस्तेमाल नहीं हो पाना चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि राज्य के सीमित संसाधनों को देखते हुए विधायक निधि का शत-प्रतिशत और सही उपयोग होना जरूरी है। विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि राज्य निर्माण का प्रमुख उद्देश्य पहाड़ों का विकास रहा है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं की कमी और पलायन जैसी समस्याएं अब भी मौजूद हैं।
उनके अनुसार पर्वतीय क्षेत्रों के विधायकों की जिम्मेदारी इसलिए और बढ़ जाती है कि वे उपलब्ध विधायक निधि का अधिकतम और उचित इस्तेमाल कर स्थानीय जरूरतों के अनुरूप विकास कार्यों को गति दें।
आंकड़ों से सामने आई तीन बड़ी तस्वीरें
पहली, जून 2026 तक प्रदेश की कुल विधायक निधि का करीब एक-तिहाई हिस्सा खर्च नहीं हुआ था।
दूसरी, विधायक निधि खर्च की दर में भौगोलिक अंतर स्पष्ट है। पहाड़ी विधानसभा क्षेत्रों की औसत खर्च दर करीब 62 प्रतिशत रही, जबकि मैदानी क्षेत्रों में यह करीब 71.1 प्रतिशत रही।
तीसरी, विधायकवार खर्च प्रतिशत के साधारण औसत में कांग्रेस का आंकड़ा करीब 68.4 प्रतिशत और भाजपा का करीब 64.4 प्रतिशत रहा। हालांकि दोनों दलों के विधायकों की संख्या और विधानसभा क्षेत्रों की परिस्थितियां अलग होने के कारण इस आंकड़े को सीधे कुल पार्टी व्यय की तुलना नहीं माना जाना चाहिए।
कुल मिलाकर RTI से सामने आया जून 2026 तक का डेटा उत्तराखंड में विधायक निधि के इस्तेमाल की असमान तस्वीर पेश करता है। एक तरफ कुछ विधानसभा क्षेत्रों में 75 से 77 प्रतिशत तक निधि खर्च हुई है, तो दूसरी तरफ कुछ क्षेत्रों में खर्च 30 से 50 प्रतिशत के बीच ही रहा।
ऐसे में सवाल केवल विधायक निधि बढ़ाने का नहीं, बल्कि उपलब्ध धनराशि को समयबद्ध और जरूरत के मुताबिक विकास कार्यों में खर्च करने की क्षमता का भी है।


