हाईकोर्ट ब्रेकिंग: मानसिक क्रूरता पर तलाक बरकरार, FIR पोर्टल पर पुलिस को हाईकोर्ट की फटकार

मानसिक क्रूरता पर तलाक बरकरार, FIR पोर्टल पर पुलिस को हाईकोर्ट की फटकार

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों में महत्वपूर्ण आदेश पारित किए हैं। एक मामले में अदालत ने करीब एक दशक पुराने वैवाहिक विवाद में देहरादून परिवार न्यायालय द्वारा दिए गए तलाक को बरकरार रखते हुए पत्नी के व्यवहार को मानसिक क्रूरता की श्रेणी में माना।

हालांकि, इसी मामले में अदालत ने पति को पूर्व पत्नी के लिए 40 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता तथा नाबालिग बेटी की शिक्षा और कल्याण के लिए 70 लाख रुपये अलग से देने का निर्देश दिया है।

दूसरे मामले में हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग की ओर से एफआईआर से संबंधित सार्वजनिक पोर्टल बंद किए जाने पर गंभीर रुख अपनाया है।

अदालत ने राज्य पुलिस से सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन को लेकर जवाब मांगा है और 23 सितंबर को तकनीकी विशेषज्ञ के माध्यम से पोर्टल एवं मोबाइल एप्लीकेशन का लाइव डेमो प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

करीब एक दशक पुराने वैवाहिक विवाद में तलाक बरकरार

जसलीन कौर सिद्धू बनाम शिखर कक्कर, प्रथम अपील संख्या 84/2024 में मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने 17 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया। दोनों पक्ष पेशे से अधिवक्ता हैं।

दोनों का विवाह 3 मार्च 2014 को हुआ था। 7 सितंबर 2015 को उनकी बेटी काव्या का जन्म हुआ। इसके बाद 19 अप्रैल 2016 से दोनों अलग-अलग रह रहे हैं।

पति ने नवंबर 2016 में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i-a) के तहत मानसिक क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी।

देहरादून परिवार न्यायालय ने 5 अप्रैल 2024 को पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित की थी। पत्नी ने परिवार न्यायालय के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुनवाई के बाद परिवार न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा।

मित्रों और सहकर्मियों के सामने अपमान के आरोप
पति की ओर से अदालत के समक्ष आरोप लगाया गया था कि पत्नी ने उसके मित्रों, सहकर्मियों और वरिष्ठ अधिकारियों के सामने कई अवसरों पर उसका अपमान किया।

इसके अलावा पत्नी की ओर से उस पर कॉरपोरेट लॉ की नौकरी छोड़ने, उसके पसंद के स्थान पर स्थानांतरित होने और अपने माता-पिता से दूरी बनाने का दबाव डालने का भी आरोप लगाया गया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति से नौकरी या स्थान बदलने के लिए कहना मात्र अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार पति-पत्नी के बीच होने वाली प्रत्येक असहमति, गुस्सा या सामान्य वैवाहिक तनाव भी मानसिक क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता।

अदालत ने मामले में घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय उनके लगातार होने और उनके सामूहिक प्रभाव पर विचार किया। पीठ ने माना कि पेशेवर सहकर्मियों और परिचितों के सामने बार-बार अपमानित किए जाने का प्रभाव व्यक्ति की गरिमा और मानसिक स्थिति पर पड़ सकता है।

उपलब्ध साक्ष्यों और पूरे वैवाहिक घटनाक्रम का आकलन करने के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि संबंधित आचरण सामान्य वैवाहिक मतभेद की सीमा से आगे बढ़ चुका था और मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।

कई बार हुई समझौते की कोशिश, लेकिन नहीं बनी सहमति

इस मामले में दोनों पक्षों के बीच विवाद को समाप्त करने के लिए कई बार समझौते और मध्यस्थता के प्रयास किए गए। हाईकोर्ट के समक्ष भी दोनों पक्षों के बीच सहमति बनाने की कोशिश हुई, लेकिन कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका।

वर्ष 2026 में भी अदालत की ओर से समझौते का एक और प्रयास किया गया, लेकिन दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन पाई। इसके बाद अदालत ने मामले के कानूनी और तथ्यात्मक पहलुओं पर फैसला सुनाया।

तलाक बरकरार, फिर पत्नी को 40 लाख रुपये क्यों?
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने पति के पक्ष में तलाक बरकरार रखने के साथ ही पूर्व पत्नी को 40 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया है।

इसे समझने के लिए तलाक और स्थायी गुजारा भत्ता के बीच कानूनी अंतर को समझना जरूरी है। अदालत ने मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक को बरकरार रखा, जबकि 40 लाख रुपये की राशि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता के रूप में निर्धारित की गई है।

इस राशि को मानसिक क्रूरता के लिए लगाया गया जुर्माना या पत्नी को दिया गया हर्जाना नहीं माना जा सकता। दोनों मुद्दे कानून के तहत अलग-अलग आधार पर तय किए गए हैं।

पत्नी की पेशेवर योग्यता और आय क्षमता पर भी अदालत की नजर

अदालत ने अपने आदेश में पत्नी की पेशेवर स्थिति को भी ध्यान में रखा। वह पेशे से अधिवक्ता हैं और पूर्व में सरकारी अधिवक्ता के रूप में भी कार्य कर चुकी हैं। अदालत ने उनकी पेशेवर योग्यता तथा स्वयं का भरण-पोषण करने की क्षमता को रिकॉर्ड पर लिया।

इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा कि पत्नी पूरी तरह बेरोजगार थीं या अपने भरण-पोषण के लिए पूरी तरह पति पर निर्भर थीं। इसके बावजूद मामले की समग्र परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने धारा 25 के तहत 40 लाख रुपये की एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता राशि निर्धारित की।

बेटी के लिए 70 लाख रुपये अलग से

अदालत ने नाबालिग बेटी की कस्टडी मां के पास ही रखने का फैसला किया है। साथ ही पिता के मुलाकात और अभिभावकीय भागीदारी के अधिकारों को भी बनाए रखा गया है।

बेटी की शिक्षा, कल्याण और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने पति को 70 लाख रुपये की एकमुश्त राशि अलग से जमा करने का निर्देश दिया है।

यह राशि पत्नी को दिया गया गुजारा भत्ता नहीं है। इसे नाबालिग बेटी के भविष्य, शिक्षा और कल्याण के लिए निर्धारित किया गया है।

1.10 करोड़ रुपये की दो अलग मदें

  • 40 लाख रुपये — पूर्व पत्नी के लिए: हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता।
  • 70 लाख रुपये — नाबालिग बेटी के लिए: उसकी शिक्षा, कल्याण और भविष्य की जरूरतों के लिए अलग से निर्धारित राशि।
  • कुल राशि: 1.10 करोड़ रुपये, लेकिन दोनों राशियों का उद्देश्य और कानूनी आधार अलग-अलग है।

पहले भी दिया गया था अंतरिम भरण-पोषण

इस मामले में आर्थिक सहायता का मुद्दा पहले की कार्यवाही में भी सामने आया था। वर्ष 2022 के एक आदेश में पति की बाद की नौकरी से करीब 3.50 लाख रुपये प्रतिमाह आय का उल्लेख किया गया था। उस समय अदालत ने बेटी के निर्वाह के लिए पत्नी को 50 हजार रुपये प्रतिमाह अंतरिम भुगतान का निर्देश दिया था।

यह अंतरिम भरण-पोषण बाद में निर्धारित 40 लाख रुपये के स्थायी गुजारा भत्ते से अलग था। यानी मुकदमे की लंबी अवधि के दौरान अंतरिम आर्थिक सहायता और अंतिम स्थायी आर्थिक राहत को अलग-अलग आधार पर देखा गया।

अब FIR सार्वजनिक पोर्टल को लेकर हाईकोर्ट सख्त

दूसरे मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग की एफआईआर से संबंधित सार्वजनिक पोर्टल की व्यवस्था को लेकर सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष हरिद्वार की ‘नेशनल पब्लिक ट्रस्ट’ की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई।

याचिका में लंबे समय से बंद पड़े सार्वजनिक पोर्टल को दोबारा शुरू करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि एफआईआर दर्ज होने के बाद उसकी जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध होनी चाहिए, जिससे पीड़ित पक्ष और उनके अधिवक्ता संबंधित मामले की जानकारी आसानी से प्राप्त कर सकें।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि पोर्टल बंद होने के बाद शिकायतकर्ताओं को केवल ओटीपी के माध्यम से जानकारी उपलब्ध कराई जा रही थी।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन पर सवाल

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग से पूछा कि एफआईआर को सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराने से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अनुपालन क्यों नहीं किया जा रहा है।

अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए यह भी संकेत दिया कि यदि पोर्टल को जल्द सुचारू रूप से संचालित नहीं किया गया तो आगामी सुनवाई में प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ सकता है।

पुलिस ने कहा- तकनीकी समस्या दूर, ऐप से डाउनलोड हो रही FIR

राज्य पुलिस की ओर से अदालत को बताया गया कि पुराने तकनीकी मुद्दों को दूर कर लिया गया है। अब आम लोग सिटीजन पोर्टल और ‘देवभूमि मोबाइल ऐप’ के माध्यम से एफआईआर डाउनलोड कर सकते हैं।

हालांकि, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष दावा किया कि उन्होंने उसी दिन सुबह संबंधित ऐप में लॉग इन करने का प्रयास किया, लेकिन ऐप काम नहीं कर रहा था।

इसके बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 23 सितंबर को तकनीकी विशेषज्ञ को अदालत के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया।

23 सितंबर को अदालत में होगा लाइव डेमो

अदालत ने निर्देश दिया है कि 23 सितंबर को तकनीकी विशेषज्ञ लाइव डेमो के माध्यम से यह प्रदर्शित करें कि संबंधित एप्लीकेशन और पोर्टल किस तरह काम कर रहे हैं और क्या आम नागरिक उनके माध्यम से एफआईआर डाउनलोड कर सकते हैं।

इस मामले की अगली सुनवाई में अदालत पोर्टल की वास्तविक कार्यप्रणाली और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुपालन की स्थिति को देखेगी।

दो मामलों में हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण निर्देश

उत्तराखंड हाईकोर्ट के इन दोनों मामलों में मुद्दे अलग-अलग हैं। वैवाहिक विवाद में अदालत ने मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक को बरकरार रखा, लेकिन धारा 25 के तहत पूर्व पत्नी के लिए 40 लाख रुपये और नाबालिग बेटी के लिए 70 लाख रुपये की अलग आर्थिक व्यवस्था की।

वहीं, एफआईआर पोर्टल के मामले में अदालत ने नागरिकों को मुकदमों की जानकारी तक पहुंच उपलब्ध कराने की व्यवस्था और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन पर राज्य पुलिस से जवाब मांगा है। 23 सितंबर को होने वाला लाइव डेमो इस मामले की आगे की सुनवाई में महत्वपूर्ण होगा।