खुलासा: उत्तराखंड में सरकारी जमीन पर कब्जों का जाल, RTI में सामने आए 3,307 मामले

उत्तराखंड में सरकारी जमीन पर कब्जों का जाल, RTI में सामने आए 3,307 मामले

-ब्यूरो रिपोर्ट
हल्द्वानी। उत्तराखंड में सरकारी और ग्राम सभा की भूमि पर अवैध कब्जों की स्थिति को लेकर सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत सामने आए आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है।

राजस्व परिषद उत्तराखंड द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2020 से 2025 के बीच प्रदेश में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण और अवैध कब्जे के कुल 3,307 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनसे प्रभावित भूमि का कुल क्षेत्रफल 1,239.28 हेक्टेयर से अधिक है।

यह जानकारी आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत सिंह गोनिया को राजस्व परिषद की ओर से 5 अगस्त 2026 को भेजे गए पत्र के माध्यम से उपलब्ध कराई गई।

जिला-वार आंकड़ों में ऊधमसिंह नगर, देहरादून, हरिद्वार और उत्तरकाशी अतिक्रमण के मामलों में प्रमुख रूप से सामने आए हैं।

उपलब्ध विवरण के अनुसार ऊधमसिंह नगर में एक हजार से अधिक मामले दर्ज हैं, जबकि देहरादून में 851, हरिद्वार में 422 और उत्तरकाशी में 360 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं।

आंकड़ों के अनुसार पौड़ी गढ़वाल में 150, टिहरी गढ़वाल में 304, नैनीताल में 131, बागेश्वर में 74, चमोली में 30, रुद्रप्रयाग में 25, पिथौरागढ़ में 21, अल्मोड़ा में 3 तथा चम्पावत में 1 मामला दर्ज किया गया है।

देहरादून जिले में वर्ष 2023 के दौरान अकेले 386 मामलों में 51.01 हेक्टेयर से अधिक भूमि अतिक्रमण से प्रभावित होने का उल्लेख किया गया है।

नैनीताल जिले के रिकॉर्ड में वर्ष 2020 से 2025 तक विभिन्न वर्षों में अतिक्रमण के मामले दर्ज हैं। इनमें वर्ष 2024 में 56 और वर्ष 2025 में 13 मामलों का उल्लेख किया गया है।

दस्तावेज के अनुसार सूचना उत्तराखंड जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950 की धारा 122 और 209 से संबंधित उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर संकलित की गई है।

राजस्व परिषद के पत्र में धारा 122 के तहत भूमि प्रबंधन समिति और कलेक्टर की जिम्मेदारियों का भी उल्लेख किया गया है।

इसके अनुसार सरकारी अथवा ग्राम सभा की भूमि पर अनधिकृत कब्जा पाए जाने पर नोटिस जारी करने, क्षति का आकलन करने, हर्जाना वसूलने और बेदखली की कार्रवाई का प्रावधान है।

कुछ मामलों में भूमि उपयोग, क्षतिपूर्ति निर्धारण और बेदखली आदेशों से जुड़े कानूनी प्रावधान भी लागू होते हैं।

आरटीआई से सामने आए ये आंकड़े सरकारी भूमि की सुरक्षा, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई और लंबित मामलों के निस्तारण को लेकर कई सवाल खड़े करते हैं।

अब यह जानना भी महत्वपूर्ण होगा कि दर्ज मामलों में कितनी भूमि अतिक्रमणमुक्त कराई गई, कितने मामलों में बेदखली हुई, कितनी वसूली की गई और वर्तमान में कितने मामले लंबित हैं।

ऐसे में जिला-वार कार्रवाई की स्थिति की विस्तृत समीक्षा की आवश्यकता महसूस की जा रही है।