दूषित पेयजल से मौतों पर हाईकोर्ट सख्त, डीएम-सीएमओ समेत अफसरों को लगाई फटकार
नैनीताल के ज्योलीकोट और आसपास के गांवों में दूषित पेयजल पीने से हुई मौतों के मामले में उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने मंगलवार को कड़ा रुख अपनाया।
वरिष्ठ न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जल संस्थान और जल निगम के अधिकारियों को तलब कर मामले की सुनवाई की।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि 21वीं सदी में दूषित पानी से लोगों की मौत होना गंभीर चिंता का विषय है। न्यायालय ने अधिकारियों को निजी प्रयोगशालाओं से भी पानी की गुणवत्ता की जांच कराने, प्रभावित क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने और मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधा देने के निर्देश दिए। मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।
याचिकाकर्ता अधिवक्ता रवि बिष्ट की ओर से कई मेडिकल रिपोर्ट पेश की गईं, जिनमें मरीजों में लिवर संबंधी गंभीर दिक्कतें सामने आने का दावा किया गया।
इस पर कोर्ट ने अधिकारियों से पूछा कि समय रहते प्रदूषण की पहचान कर कार्रवाई क्यों नहीं की गई और मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने की क्या योजना है।
खंडपीठ ने कहा कि यदि स्थानीय स्तर पर विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं तो बाहर से विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम बुलाई जाए।
साथ ही जल संस्थान और जल निगम को यह सुनिश्चित करने को कहा कि सीवर और पेयजल की लाइनें किसी भी स्थिति में मिश्रित न हों। जिलाधिकारी को टैंकरों के माध्यम से प्रभावित गांवों तक सुरक्षित पानी पहुंचाने के निर्देश भी दिए गए।
कोर्ट ने नैनीताल क्षेत्र में भी पेयजल स्रोतों और सीवर लाइनों की व्यापक जांच कराने को कहा। 20 से 25 अलग-अलग स्थानों से पानी के नमूने लेकर परीक्षण कराने और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को छह दिन के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है।
सुनवाई के दौरान सीएमओ रश्मि पंत ने बताया कि बीमारी का मुख्य कारण दूषित पानी है। प्रभावित लोगों का इलाज आयुष्मान योजना के तहत कराया जाएगा।
सात गांवों में मेडिकल टीमें तैनात हैं, घर-घर क्लोरीन टैबलेट और ओआरएस वितरित किए जा रहे हैं तथा आठ डॉक्टर और एक एम्बुलेंस मौके पर मौजूद हैं।
जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने कोर्ट को बताया कि जांच में पुराने कूड़ा निस्तारण स्थल के पास स्रोत और सीवर का पानी आपस में मिलने की पुष्टि हुई है, जिससे लोगों की तबीयत बिगड़ी।
वहीं जल संस्थान ने दावा किया कि शुरुआती जांच में कोई संदूषण नहीं मिला था, लेकिन बाद में स्थानीय धाराओं में सीवर मिश्रण की आशंका सामने आई।
टेस्टिंग लैब की कमी पर नाराजगी जताते हुए हाईकोर्ट ने सरकार से कुमाऊं क्षेत्र के लिए प्रस्तावित जल परीक्षण प्रयोगशाला पर शीघ्र निर्णय लेने को कहा।
न्यायालय ने मामले को “महामारी जैसी स्थिति” बताते हुए राहत और बचाव कार्यों की निगरानी स्वयं जिलाधिकारी द्वारा किए जाने के निर्देश दिए।


