एक ओर कांवड़ यात्रा का शंखनाद, दूसरी ओर अखाड़ों में छिड़ी वर्चस्व की जंग
हरिद्वार। उत्तराखंड की धर्मनगरी हरिद्वार एक बार फिर आस्था, सुरक्षा और धार्मिक राजनीति के केंद्र में आ गई है। एक ओर 30 जुलाई से शुरू हो रहे कांवड़ मेले को लेकर लाखों शिवभक्त हरिद्वार पहुंच रहे हैं, जिसके मद्देनजर पुलिस और प्रशासन ने अभूतपूर्व सुरक्षा एवं ट्रैफिक व्यवस्था लागू कर दी है।
वहीं दूसरी ओर वर्ष 2027 के प्रस्तावित अर्धकुंभ से पहले अखाड़ा परिषद में नेतृत्व की लड़ाई और नया उदासीन अखाड़े में असली-नकली देवताओं के विवाद ने संत समाज में नई बहस छेड़ दी है। ऐसे में हरिद्वार इस समय केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि धार्मिक और संगठनात्मक संघर्ष का भी साक्षी बन रहा है।
कांवड़ मेले को देखते हुए हरिद्वार पुलिस ने पूरे मेला क्षेत्र को 18 सुपर जोन, 40 जोन और 141 सेक्टरों में विभाजित कर अधिकारियों की तैनाती की है। यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए विस्तृत ट्रैफिक प्लान लागू कर दिया गया है।
पुलिस ने लोगों से अपील की है कि यात्रा पर निकलने से पहले ट्रैफिक डायवर्जन की जानकारी अवश्य लें। दिल्ली, मेरठ, मुजफ्फरनगर, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, सहारनपुर, देहरादून, ऋषिकेश और नजीबाबाद से आने वाले वाहनों के लिए अलग-अलग रूट निर्धारित किए गए हैं।
कांवड़ वाहनों, रोडवेज बसों, निजी बसों और भारी वाहनों के लिए अलग यातायात व्यवस्था लागू रहेगी। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे पर कांवड़ वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाई गई है, जबकि भारी वाहनों पर भी चरणबद्ध प्रतिबंध लागू रहेगा।
प्रशासन का कहना है कि इस बार करोड़ों श्रद्धालुओं के हरिद्वार पहुंचने की संभावना है। इसी कारण पार्किंग, सुरक्षा, सीसीटीवी निगरानी, ड्रोन सर्विलांस और आपातकालीन सेवाओं को भी मजबूत किया गया है ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
कांवड़ मेले के बीच आस्था का एक अनोखा स्वरूप भी देखने को मिला। मेरठ निवासी 53 वर्षीय हरपाल नाथ रामराज घुटनों के बल चलकर हरिद्वार पहुंचे और यहां से गंगाजल लेकर नेपाल स्थित प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर तक करीब 2400 किलोमीटर की कठिन यात्रा पर रवाना हुए।
वह यह यात्रा लगभग 411 दिनों में पूरी करेंगे। इससे पहले भी वह हरिद्वार से सोनभद्र तक करीब 1800 किलोमीटर की कठिन कांवड़ यात्रा कर चुके हैं। उनका कहना है कि यह किसी व्यक्तिगत मनोकामना के लिए नहीं, बल्कि भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है।
उधर, कांवड़ मेले की तैयारियों के समानांतर वर्ष 2027 के प्रस्तावित अर्धकुंभ को लेकर अखाड़ों में नेतृत्व का विवाद गहराता जा रहा है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद दो गुटों में बंटी हुई दिखाई दे रही है।
दोनों गुट स्वयं को असली परिषद बताते हुए बहुमत का दावा कर रहे हैं। एक पक्ष महंत रविंद्र पुरी और हरिगिरि महाराज के नेतृत्व का समर्थन कर रहा है, जबकि दूसरा पक्ष महानिर्वाणी अखाड़े सहित अन्य अखाड़ों के साथ अपनी वैधता का दावा कर रहा है।
इससे मेला प्रशासन और सरकार के सामने भी यह चुनौती खड़ी हो गई है कि आधिकारिक तौर पर किस परिषद के साथ समन्वय स्थापित किया जाए।
विवाद केवल परिषद के नेतृत्व तक सीमित नहीं रहा। नया उदासीन अखाड़े से जुड़े कुछ संतों ने यह दावा कर सनसनी फैला दी कि हरिद्वार में वर्षों से जिन देवी-देवताओं की पूजा और शाही स्नान कराया जाता रहा है, वे वास्तविक नहीं हैं और असली देवता पंजाब में सुरक्षित हैं। इस बयान के बाद संत समाज में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
महानिर्वाणी गुट ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए इसे भ्रम फैलाने की कोशिश करार दिया है और जरूरत पड़ने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है।
आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि महाराज ने पूरे विवाद को गंभीर बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
उनका कहना है कि यह विषय केवल किसी अखाड़े का आंतरिक विवाद नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा मामला है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि देवता कभी नकली नहीं हो सकते और धार्मिक परंपराओं से जुड़े किसी भी विवाद का समाधान तथ्यों, संवाद और परंपरागत व्यवस्था के माध्यम से होना चाहिए।
उत्तराखंड सरकार भी फिलहाल पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। सरकार का कहना है कि वह उम्मीद करती है कि सभी अखाड़े आपसी संवाद के माध्यम से विवाद का समाधान निकालेंगे।
वहीं धर्म विशेषज्ञों का मानना है कि अर्धकुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजन से पहले इस प्रकार के विवादों का शांतिपूर्ण समाधान आवश्यक है, ताकि श्रद्धालुओं के बीच किसी प्रकार का भ्रम पैदा न हो।
इस बीच हरिद्वार में एक ओर “बोल बम” के जयघोष से आस्था का महासागर उमड़ रहा है, तो दूसरी ओर अखाड़ों की अंदरूनी खींचतान आने वाले अर्धकुंभ की तैयारियों पर सवाल खड़े कर रही है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि प्रशासन कांवड़ मेले को किस तरह सफलतापूर्वक संपन्न कराता है और संत समाज अपने मतभेदों को दूर कर अर्धकुंभ की तैयारियों को किस दिशा में आगे बढ़ाता है।


