RTI पर ‘9 लाख’ की दीवार! सूचना देने के बजाय उद्यान विभाग ने मांगे ₹9.36 लाख
हल्द्वानी। उत्तराखण्ड के उद्यान एवं बागवानी विभाग से सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, 2005 के तहत विभिन्न सरकारी योजनाओं, बजट, ऑडिट रिपोर्ट, निरीक्षण रिपोर्ट, विकास कार्यों और सरकारी खर्च से संबंधित सूचनाएं मांगने पर विभाग की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है।
विभाग के विभिन्न जनपदों के लोक सूचना अधिकारियों ने सूचना उपलब्ध कराने के बजाय आवेदक से कुल ₹9,36,340 जमा कराने की मांग कर दी है।
विभाग द्वारा जारी पत्रों के अनुसार **मुख्य उद्यान अधिकारी, नैनीताल (भीमताल)** ने *₹7,24,004*, **मुख्य उद्यान अधिकारी, पिथौरागढ़** ने **₹9,882**, **जिला उद्यान अधिकारी, बागेश्वर** ने **₹31,812**, **निदेशालय उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण, चौबटिया-रानीखेत** ने **₹1,796** तथा **जिला उद्यान अधिकारी, चम्पावत** ने **₹1,68,846** जमा कराने को कहा है। इस प्रकार कुल मांगी गई राशि **₹9,36,340** पहुंच गई।
आरटीआई कार्यकर्ता **हेमंत सिंह गौनिया** का आरोप है कि विभाग द्वारा दिए गए उत्तर सूचना का अधिकार अधिनियम की भावना के अनुरूप नहीं हैं। उनका कहना है कि कई मामलों में मूल आरटीआई आवेदन की प्रति तक संलग्न नहीं की गई, प्रश्नवार उत्तर नहीं दिए गए और मांगी गई सूचनाएं अधूरी एवं अपूर्ण भेजी गईं।
उनका तर्क है कि जब सूचना नियमानुसार उपलब्ध नहीं कराई गई है, तो ऐसे मामलों में अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार सूचना निःशुल्क उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
हेमंत सिंह गौनिया ने बताया कि सभी मामलों में संबंधित प्रथम अपीलीय अधिकारियों के समक्ष प्रथम अपील दायर कर दी गई है। अपील में पूर्ण, प्रमाणित, प्रश्नवार और निःशुल्क सूचना उपलब्ध कराने की मांग की गई है।
यदि प्रथम अपील में भी संतोषजनक निर्णय नहीं मिलता है, तो सभी मामलों को उत्तराखण्ड राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील के माध्यम से ले जाया जाएगा। साथ ही संबंधित लोक सूचना अधिकारियों द्वारा अधिनियम के कथित उल्लंघन का मुद्दा भी उठाया जाएगा।
यह मामला अब एक बड़े सवाल को जन्म दे रहा है कि जब सरकारी रिकॉर्ड को डिजिटल और कम्प्यूटरीकृत रखने की व्यवस्था लागू है, तब सूचना प्राप्त करने के लिए किसी नागरिक से **₹9.36 लाख** जैसी भारी-भरकम राशि मांगना क्या पारदर्शिता की भावना के अनुरूप है या फिर सूचना तक आम नागरिक की पहुंच को कठिन बनाने का प्रयास? अब इस पूरे मामले पर प्रथम अपीलीय अधिकारियों और उसके बाद सूचना आयोग के रुख पर सभी की निगाहें टिकी हैं।


