बिग ब्रेकिंग: सुप्रीम कोर्ट के 8 बड़े फैसले। कई अहम मामलों में तय किए नए कानूनी मानक

सुप्रीम कोर्ट के 8 बड़े फैसले। कई अहम मामलों में तय किए नए कानूनी मानक

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश की न्यायिक व्यवस्था, सरकारी भर्ती, रेलवे सुरक्षा, कर्मचारियों के अधिकार, अदालतों की शक्तियों और नागरिक अधिकारों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों में ऐसे फैसले सुनाए हैं, जिन्हें भविष्य में कानूनी मिसाल के रूप में देखा जाएगा।

अलग-अलग मामलों में सुनाए गए इन निर्णयों के जरिए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका का उद्देश्य केवल कानून की व्याख्या करना नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता और आम नागरिकों के अधिकारों की प्रभावी रक्षा सुनिश्चित करना भी है।

सुप्रीम कोर्ट ने सबसे अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत हाईकोर्ट ‘सर्टिओरारी’ की रिट जारी करते समय निचली अदालतों द्वारा रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकता।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि रिट अधिकार क्षेत्र का उद्देश्य केवल अधिकार क्षेत्र से जुड़ी त्रुटियों या स्पष्ट कानूनी गलतियों को सुधारना है, न कि अपीलीय अदालत की तरह सबूतों की दोबारा जांच करना। इसी आधार पर कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए पहली अपीलीय अदालत का निर्णय बहाल कर दिया गया।

एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा अबू धाबी, कुवैत, सिंगापुर और कैनबरा स्थित भारतीय मिशनों में कॉन्सुलर, पासपोर्ट और वीजा सेवाओं के आउटसोर्सिंग टेंडर रद्द करने के फैसले को चुनौती दी गई थी।

अदालत ने माना कि टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और स्पष्ट होनी चाहिए। हालांकि विदेशों में भारतीय नागरिकों को सेवाएं प्रभावित न हों, इसके लिए विदेश मंत्रालय और इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL) को अंतरिम व्यवस्था जारी रखने तथा तीन महीने के भीतर नई टेंडर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया गया।

न्यायिक भर्ती से जुड़े एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान उच्च न्यायिक सेवा में एडिशनल जिला जज भर्ती के लिए इंटरव्यू में न्यूनतम 25 प्रतिशत अंक की अनिवार्यता को वैध ठहराया।

अदालत ने कहा कि वाइवा-वोस केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं बल्कि उम्मीदवार के व्यक्तित्व, निर्णय क्षमता, संतुलन, निष्पक्षता और न्यायिक गुणों की परीक्षा है। इसलिए केवल लिखित परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करना नियुक्ति का आधार नहीं बन सकता।

साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चयन प्रक्रिया में बिना आपत्ति शामिल होने वाला उम्मीदवार बाद में उसी नियम को चुनौती नहीं दे सकता।

कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया। अदालत ने कहा कि कोई भी नियोक्ता मेडिकल आधार पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के आवेदन पर जानबूझकर देरी कर बाद में कर्मचारी की उम्र सीमा पार होने का हवाला देकर उसके आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं कर सकता।

कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक लापरवाही या देरी का लाभ सरकारी संस्था या नियोक्ता नहीं उठा सकता। इसी आधार पर न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी को कर्मचारी के पुत्र को अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया गया।

रेलवे यात्रियों की सुरक्षा पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे को भीड़ नियंत्रण के लिए प्रभावी और दीर्घकालिक उपाय करने के निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि भीड़ के कारण चलती ट्रेनों से गिरकर होने वाली मौतें अब चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी हैं।

रेलवे को अतिरिक्त स्टाफ नियुक्त करने, भीड़ प्रबंधन मजबूत करने और सुरक्षा व्यवस्था बेहतर बनाने की सलाह देते हुए कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि रेलवे अपने मैनुअल से “सेकंड क्लास पैसेंजर” शब्द हटाए, क्योंकि संविधान की भावना के अनुसार वर्गीकरण कोच का होना चाहिए, यात्री का नहीं। इसी मामले में कोर्ट ने मृत यात्री के परिजनों को आठ लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी दिया।

शीर्ष अदालत ने एक अन्य मामले में नौ वर्ष से अधिक समय से जेल में बंद हत्या के आरोपी को जमानत देते हुए कहा कि जब कोई आरोपी न्यायिक हिरासत में हो तो अदालत और अभियोजन एजेंसी दोनों की जिम्मेदारी है कि मुकदमे का शीघ्र निस्तारण कराया जाए।

कोर्ट ने कहा कि अनावश्यक देरी न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है और “बेल नियम है, जेल अपवाद” की संवैधानिक अवधारणा को हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए।

अभिव्यक्ति और आपराधिक कानून से जुड़े एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल गाली-गलौज, अपशब्द या अभद्र भाषा का प्रयोग अपने आप में भारतीय दंड संहिता की धारा 294 के तहत अश्लीलता नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि किसी शब्द को अश्लील तभी माना जाएगा जब उसमें कामुकता हो, वह यौन उत्तेजना पैदा करने वाला हो और समाज पर भ्रष्ट प्रभाव डालने की क्षमता रखता हो।

इसी आधार पर कोर्ट ने एक मामले में धारा 294 और आपराधिक धमकी से जुड़ी दोषसिद्धि समाप्त कर दी, जबकि गंभीर चोट पहुंचाने के अपराध में सजा बरकरार रखी।

इन फैसलों के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायिक संस्थाओं की शक्तियां कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं में ही प्रयोग होंगी, सरकारी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता अनिवार्य होगी, कर्मचारियों और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी तथा न्यायपालिका तकनीकी आधारों की बजाय वास्तविक और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करने के सिद्धांत पर आगे बढ़ेगी।

कानून विशेषज्ञों का मानना है कि ये फैसले आने वाले समय में न्यायिक और प्रशासनिक निर्णयों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक साबित होंगे।