पिथौरागढ़ में टोंड मिल्क सैंपल फेल। 6 साल बाद कोर्ट ने कंपनियों पर ठोका जुर्माना
पिथौरागढ़। उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ से खाद्य सुरक्षा को लेकर एक अहम मामला सामने आया है, जहां टोंड मिल्क का सैंपल अधोमानक (सब-स्टैंडर्ड) पाए जाने पर अदालत ने दो नामी फूड कंपनियों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। वहीं संबंधित जनरल स्टोर संचालक पर भी 25 हजार रुपये का जुर्माना ठोका गया है।
जांच में फेल हुआ दूध का सैंपल
खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशासन के असिस्टेंट कमिश्नर राजेश शर्मा के अनुसार, 28 सितंबर 2019 को खाद्य सुरक्षा अधिकारी विपिन कुमार ने थल क्षेत्र के बिछुल में दुकानों का निरीक्षण किया था। इसी दौरान एक जनरल स्टोर से टोंड मिल्क का नमूना लिया गया, जिसे जांच के लिए रुद्रपुर स्थित राजकीय प्रयोगशाला भेजा गया।
करीब एक साल बाद, 15 अक्टूबर 2020 को आई रिपोर्ट में यह दूध का सैंपल अधोमानक पाया गया। जांच में दूध में निर्धारित मानकों के अनुरूप फैट की मात्रा नहीं मिली, जिसके चलते इसे फेल घोषित किया गया।
एडीएम कोर्ट ने सुनाया फैसला
मामले में जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी राजेंद्र सिंह कठायत द्वारा विक्रेता, निर्माता और विपणनकर्ता कंपनी के खिलाफ वाद दायर किया गया था। यह मामला लंबे समय तक एडीएम कोर्ट में विचाराधीन रहा। आखिरकार 22 अप्रैल 2026 को न्याय निर्णायक अधिकारी एवं एडीएम
योगेंद्र सिंह की अदालत ने फैसला सुनाते हुए:
- निर्माता कंपनी पर ₹50,000 जुर्माना
- विपणनकर्ता कंपनी पर ₹50,000 जुर्माना
- जनरल स्टोर संचालक पर ₹25,000 जुर्माना
लगाया है। - कुल मिलाकर इस मामले में ₹1.25 लाख का आर्थिक दंड लगाया गया।
6 साल चली कानूनी प्रक्रिया
यह मामला करीब 6 वर्षों तक न्यायालय में लंबित रहा, जिसके बाद अब जाकर अंतिम निर्णय सामने आया है। यह कार्रवाई खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर सख्ती का संकेत मानी जा रही है।
कब क्या हुआ – एक नजर में
- 28 सितंबर 2019: थल क्षेत्र से टोंड मिल्क का सैंपल लिया गया
- सैंपल को जांच के लिए रुद्रपुर लैब भेजा गया
- 15 अक्टूबर 2020: रिपोर्ट में सैंपल सब-स्टैंडर्ड पाया गया
- विभाग ने अदालत में वाद दायर किया
- करीब 6 साल तक सुनवाई चली
- 22 अप्रैल 2026: एडीएम कोर्ट ने जुर्माना लगाया
संदेश साफ: गुणवत्ता से समझौता नहीं
इस फैसले के बाद साफ हो गया है कि खाद्य सुरक्षा मानकों से किसी भी तरह का समझौता करने पर कंपनियों और विक्रेताओं को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

