पीजी से पहले की सेवा का मिलेगा लाभ, हाईकोर्ट ने दिया स्पष्ट निर्देश
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एमबीबीएस के बाद पीजी करने वाले डॉक्टरों के सेवा बॉन्ड मामले में अहम फैसला सुनाते हुए बड़ी राहत दी है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी डॉक्टर ने पीजी में प्रवेश से पहले दुर्गम क्षेत्रों में सेवा दी है, तो उस अवधि को पीजी के बाद की अनिवार्य सेवा में समायोजित किया जाएगा।
डॉक्टरों की याचिका पर सुनवाई
यह मामला डॉ. मेहुल सिंह गुंज्याल और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। उनका कहना था कि उन्होंने पहले ही बॉन्ड के तहत सेवा दे दी है, ऐसे में पीजी के बाद दोबारा पूरी सेवा अवधि लागू करना अनुचित है।
सरकार ने जताई थी आपत्ति
राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी थी कि नियमानुसार एमबीबीएस और पीजी के बाद अलग-अलग सेवा अवधि अनिवार्य है। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि इस तरह की छूट दी गई तो बॉन्ड की राशि वसूलने में कठिनाई हो सकती है।
अदालत ने दोनों पक्षों को संतुलित किया
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि,
- सरकार का बॉन्ड राशि वसूलने का अधिकार बना रहेगा
- लेकिन सेवा की गणना में पहले की सेवा अवधि को शामिल किया जाएगा
कैसे मिलेगा लाभ
फैसले के अनुसार, यदि किसी डॉक्टर ने एमबीबीएस के बाद एक वर्ष सेवा दी है, तो पीजी के बाद उसे केवल शेष अवधि ही पूरी करनी होगी, न कि पूरी तीन साल की सेवा।
देरी को भी किया माफ
अदालत ने राज्य सरकार द्वारा अपील दाखिल करने में हुई 127 दिनों की देरी को भी माफ कर दिया और मामले का अंतिम निस्तारण कर दिया।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ेगा असर
इस फैसले से डॉक्टरों को अनावश्यक दोहरी सेवा से राहत मिलेगी। दुर्गम क्षेत्रों में सेवा देने के लिए प्रोत्साहन बढ़ेगा। सेवा बॉन्ड से जुड़े विवादों में स्पष्टता आएगी। यह निर्णय राज्य के चिकित्सा ढांचे और डॉक्टरों के हितों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।



