पौड़ी में मासूम की मौत के बाद गुलदार ‘आदमखोर’ घोषित, पकड़ने या मारने के आदेश
उत्तराखंड। पौड़ी गढ़वाल जिले के चौबट्टाखाल विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत ग्रामसभा गडरी के तोक ग्राम भतकोट में 4 वर्षीय मासूम बच्ची दृष्टि को अपना शिकार बनाने वाले गुलदार को वन विभाग ने ‘आदमखोर’ घोषित कर दिया है। घटना की गंभीरता को देखते हुए विभाग ने उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई के आदेश जारी किए हैं।
वन विभाग द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, सबसे पहले गुलदार को ट्रैंकुलाइज कर पकड़ने और पिंजरे में कैद करने का प्रयास किया जाएगा। यदि वह काबू में नहीं आता और मानव जीवन के लिए खतरा बना रहता है, तो उसे मार गिराने की कार्रवाई की जाएगी।
घटना गुरुवार रात करीब 9 बजे की बताई जा रही है। भतकोट निवासी हरेंद्र की चार वर्षीय पुत्री दृष्टि घर के आंगन में खेल रही थी, तभी घात लगाए बैठे गुलदार ने अचानक हमला कर उसे जबड़ों में दबाकर खेतों की ओर ले गया।
परिजनों के शोर मचाने पर ग्रामीण मौके पर पहुंचे और देर रात तक तलाश अभियान चलाया गया। काफी खोजबीन के बाद बच्ची का शव घर से लगभग एक किलोमीटर दूर झाड़ियों में बरामद हुआ।
घटना के बाद क्षेत्र में भारी आक्रोश फैल गया। ग्रामीणों ने डीएफओ कार्यालय का घेराव करते हुए गुलदार को तत्काल मारने की मांग की। वन विभाग के आश्वासन के बाद स्थिति शांत हुई। इसके पश्चात डीएफओ की रिपोर्ट के आधार पर प्रमुख वन संरक्षक (वन्यजीव) ने आवश्यक कार्रवाई के आदेश जारी कर दिए।
राज्य में बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष
उत्तराखंड में बीते कुछ समय से मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार राज्य के लगभग 490 गांव संवेदनशील श्रेणी में आ चुके हैं, जहां गुलदार, भालू, हाथी और बाघ का खतरा बना हुआ है।
गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों के कई जिले इस संकट से प्रभावित हैं। पौड़ी गढ़वाल, टिहरी, रुद्रप्रयाग और चमोली में गुलदार व भालू के हमले लगातार सामने आ रहे हैं, जबकि पिथौरागढ़, नैनीताल और बागेश्वर में भी ऐसी घटनाओं में वृद्धि दर्ज की गई है।
प्रमुख आंकड़े
- गुलदार हमले (2025): 18 मौतें, 105 घायल
- भालू हमले: 8 मौतें, 107 घायल
- हाथी हमले: राज्यभर में कई घटनाएं, कम से कम 4 मौत
पौड़ी की यह घटना राज्य में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता को उजागर करती है। जंगलों के सिमटने और आबादी के विस्तार के चलते जंगली जानवर अब रिहायशी इलाकों तक पहुंच रहे हैं, जिससे आम जनजीवन पर खतरा लगातार बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस समस्या के समाधान के लिए दीर्घकालिक और ठोस रणनीति की आवश्यकता है।

