हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14(1) पर दिल्ली हाईकोर्ट की अहम व्याख्या, पढ़ें….
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार कानून से जुड़े एक अहम फैसले में कहा है कि पहले से मृत बेटे की अविवाहित नाबालिग बेटी का भरण-पोषण करने का दायित्व एक “पहले से मौजूद अधिकार” हो सकता है,
जो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के तहत महिला की सीमित संपत्ति को पूर्ण स्वामित्व में बदलने में सक्षम है।
जस्टिस पुरुशैन्द्र कुमार कौरव ने कहा कि शास्त्रीय हिंदू कानून महिलाओं की सुरक्षा और भरण-पोषण के लिए निरंतर पारिवारिक दायित्व को मान्यता देता है। यह दायित्व केवल पिता की मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होता, बल्कि निकटतम रिश्तेदारों पर स्थानांतरित हो जाता है।
शास्त्रीय हिंदू कानून का हवाला
कोर्ट ने याज्ञवल्क्य स्मृति (श्लोक 1.85) का हवाला देते हुए कहा कि हिंदू कानून में महिला की रक्षा और भरण-पोषण को मूलभूत कर्तव्य माना गया है। इसमें दायित्व का स्पष्ट क्रम तय किया गया है—नाबालिग अवस्था में पिता, विवाह के बाद पति और वृद्धावस्था में पुत्रों पर यह जिम्मेदारी होती है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि इस क्रम में पहले जिम्मेदार व्यक्ति मौजूद नहीं हैं, तो यह दायित्व समाप्त नहीं होता बल्कि परिवार के निकटतम रिश्तेदारों पर आ जाता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला नई दिल्ली के कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित एक संपत्ति के बंटवारे से जुड़ा है। मुकदमा मूल मालिक के पहले से मृत बेटे की 79 वर्षीय अविवाहित बेटी द्वारा दायर किया गया था। प्रतिवादी मूल मालिक के अन्य जीवित बेटों के वंशज थे।
प्रतिवादियों का तर्क था कि महिला को 1956 की गिफ्ट डीड के तहत केवल जीवन भर का सीमित अधिकार मिला था और प्रतिबंधात्मक शर्तों के कारण वह पूर्ण स्वामित्व में नहीं बदल सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा
हाईकोर्ट ने V. Tulasamma बनाम Sesha Reddy मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए कहा कि जो दस्तावेज़ केवल पहले से मौजूद अधिकारों को मान्यता देते हैं, वे महिला की संपत्ति के कानूनी विस्तार को सीमित नहीं कर सकते।
कोर्ट ने कहा कि यदि वादी महिला का भरण-पोषण का कोई पूर्व-विद्यमान अधिकार था और उसी की पहचान में उसे जीवन भर का अधिकार दिया गया, तो धारा 14(1) के तहत वह संपत्ति उसकी पूर्ण संपत्ति मानी जाएगी।
नैतिक दायित्व से कानूनी दायित्व तक
कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू कानून के तहत दादा, सबसे करीबी सगोत्र संबंधी होने के नाते, अपने पहले मर चुके बेटे की अविवाहित नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए नैतिक रूप से बाध्य हो सकते हैं।
एक बार जब संपत्ति ऐसे आश्रित और अन्य वारिसों को संयुक्त रूप से दी जाती है, तो भरण-पोषण का यह दायित्व सह-हिस्सेदारों पर कानूनी दायित्व में बदल सकता है।
मुकदमा खारिज करने से इनकार
कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 11 के तहत दायर वह अर्जी भी खारिज कर दी, जिसमें मुकदमे को लिमिटेशन और कारण-ए-दावा के अभाव में खारिज करने की मांग की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि अधिकार से इनकार का प्रश्न हालिया है, इसलिए मुकदमा प्रथम दृष्टया सुनवाई योग्य है।



