ज्योलिकोट जल संकट पर हाईकोर्ट सख्त, मुख्य सचिव से मांगा जवाब
नैनीताल। ज्योलिकोट और आसपास के गांवों में दूषित पेयजल से सैकड़ों लोगों के बीमार होने तथा दो लोगों की मौत के मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने राज्य के मुख्य सचिव को शपथपत्र (एफिडेविट) दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही न्यायालय ने अधिकारियों की व्यक्तिगत पेशी समाप्त करने से साफ इनकार करते हुए इसे आगे भी जारी रखने का आदेश दिया है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मामले की जांच और निगरानी के लिए गठित समिति में जल संस्थान, जल निगम, स्वास्थ्य विभाग और अन्य संबंधित विभागों के साथ प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) को भी शामिल किया जाए। मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह निर्धारित की गई है।
सुनवाई के दौरान नैनीताल के जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने अदालत को बताया कि समस्या का ब्रेकआउट 20 अगस्त को सामने आया था।
जल संस्थान की प्रयोगशाला में पानी की जांच कराई गई थी, लेकिन न्यायालय के निर्देशों के बाद बाहरी एजेंसी से कराई गई जांच में पहली 10 रिपोर्टें फेल पाई गई हैं।
उन्होंने बताया कि प्रभावित क्षेत्रों में फिलहाल टैंकरों के माध्यम से पेयजल आपूर्ति की जा रही है और स्वास्थ्य विभाग लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
डीएम ने अदालत को यह भी बताया कि अधिकांश मरीज हेपेटाइटिस-ए और पीलिया (जॉन्डिस) से पीड़ित पाए गए हैं। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ डॉक्टरों को भी बुलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पानी में हुए प्रदूषण की वजह से यह स्थिति उत्पन्न हुई है और आगे की जांच व कार्रवाई का निर्णय राज्य सरकार करेगी।
वहीं, पीसीबी की ओर से अधिवक्ता आदित्य प्रताप सिंह ने अदालत को बताया कि 10 अलग-अलग स्थानों से लिए गए पानी के नमूनों की जांच में भारतीय पेयजल मानकों के अनुरूप गुणवत्ता नहीं पाई गई।
रिपोर्ट में पानी में मानव और पशुओं के मल-मूत्र के मिश्रण की पुष्टि हुई है, जिससे जल स्रोतों के गंभीर रूप से दूषित होने का संकेत मिला है।
गौरतलब है कि जहां जल संस्थान की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सामान्य बताई गई थी, वहीं हाईकोर्ट के आदेश पर पीसीबी द्वारा लिए गए 20 से अधिक नमूनों में से अब तक आई 10 रिपोर्टों ने पानी को दूषित करार दिया है।
अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि अब तक करीब 200 मामले सामने आए हैं, जिनमें 131 मरीज पीलिया (जॉन्डिस) और 88 मरीज हेपेटाइटिस-ए से प्रभावित हैं।
यह जनहित याचिका अधिवक्ता रवि बिष्ट द्वारा दायर की गई है। 8 सितंबर को हुई पिछली सुनवाई में न्यायालय ने मामले पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा था कि “21वीं सदी में भी ऐसी स्थिति चिंताजनक है। तुमने बीमारी दी है, तुम ही इलाज कराओ।”
याचिकाकर्ता रवि बिष्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने अब मुख्य सचिव से विस्तृत एफिडेविट दाखिल करने को कहा है और स्पष्ट कर दिया है कि मामले में जवाबदेही तय होने तक अधिकारियों की व्यक्तिगत पेशी जारी रहेगी। अदालत के इस सख्त रुख से प्रभावित क्षेत्र के लोगों को न्याय और राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।


