बिग ब्रेकिंग: धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों के रजिस्ट्रेशन की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार

धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों के रजिस्ट्रेशन की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें केंद्र और राज्यों को 14 वर्ष तक के बच्चों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी स्कूलों और संस्थानों को रजिस्टर करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने याचिकाकर्ता को उचित प्राधिकरण (अथॉरिटी) से संपर्क करने की स्वतंत्रता देते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा,
“कोर्ट के सामने आपको यह दिखाना होगा कि आपने उसी प्रार्थना के साथ अथॉरिटी से संपर्क किया और अथॉरिटी ने या तो उस पर विचार करने से इनकार कर दिया है या कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। पहले आप अथॉरिटी के पास जाएं, अगले राउंड में हम इस पर विचार करेंगे।”

यह याचिका एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई थी, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 21A, 39(f), 45 और 51A(k) की भावना के अनुरूप 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों के रजिस्ट्रेशन के निर्देश देने की मांग की गई थी।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g), 26 और 30 के दायरे तथा अनुच्छेद 30 में प्रयुक्त “अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान” शब्दों के अर्थ को लेकर भी घोषणाएं मांगी गई थीं।

शुरुआत में जस्टिस दत्ता ने मांगी गई राहत पर सवाल उठाते हुए कहा कि कोर्ट को यह स्पष्ट नहीं है कि “रजिस्ट्रेशन” से याचिकाकर्ता का आशय क्या है। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि प्रार्थना को “मान्यता” (recognition) की मांग के रूप में समझा जाना चाहिए।

इसके बाद पीठ ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट आने से पहले संबंधित अथॉरिटी के समक्ष कोई प्रतिनिधित्व प्रस्तुत नहीं किया था। बेंच ने कहा कि पहले कार्यपालिका को इस मुद्दे पर विचार करने का अवसर दिया जाना चाहिए।

शंकरनारायणन ने दलील दी कि इस मुद्दे पर विभिन्न हाईकोर्ट्स के बीच मतभेद है। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना है कि बिना मान्यता के भी ऐसा संस्थान चल सकता है, जबकि केरल हाईकोर्ट ने इसके विपरीत रुख अपनाते हुए ऐसे संस्थानों को बंद करने योग्य बताया है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका केवल मदरसों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी संस्थानों पर लागू होती है जो बच्चों को धार्मिक शिक्षा प्रदान करते हैं। याचिकाकर्ता की चिंता उन बच्चों को लेकर है जिन्हें अनिवार्य शिक्षा नहीं मिल रही और जो केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित हैं।

हालांकि, जस्टिस दत्ता ने कहा कि इस विषय से पहले एग्जीक्यूटिव को निपटना चाहिए। इसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता को उचित अथॉरिटी से संपर्क करने की छूट देते हुए रिट याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।

याचिका के अनुसार, कार्रवाई का कारण 16 जनवरी 2026 को सामने आया, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मदरसा अहले सुन्नत इमाम अहमद रज़ा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में एक गैर-पंजीकृत मदरसे को धार्मिक शिक्षा देने की अनुमति दी थी।

याचिका में दावा किया गया कि जांच के दौरान बड़ी संख्या में गैर-पंजीकृत मदरसे सामने आए, विशेषकर सीमावर्ती जिलों में। इसमें कहा गया कि हजारों गैर-पंजीकृत और अनियमित संस्थाएं बच्चों को धार्मिक शिक्षा दे रही हैं।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 21A, 39(f), 45 और 51A(k) मिलकर राज्य को मुफ्त, अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करते हैं, जो पंजीकरण और पर्यवेक्षण के बिना संभव नहीं है।

याचिका में यह भी कहा गया कि बच्चे अपनी कम उम्र के कारण अत्यंत संवेदनशील होते हैं और धार्मिक ब्रेनवाशिंग व हेरफेर के खतरे के प्रति अधिक असुरक्षित होते हैं। इसके अलावा, तस्करी और बाल श्रम को रोकने के लिए भी रजिस्ट्रेशन को आवश्यक बताया गया।

साथ ही तर्क दिया गया कि बिना पंजीकृत संस्थानों में न तो शिक्षकों की नियुक्ति के मानक होते हैं और न ही पाठ्यक्रम का कोई ऑडिट, जिससे राज्य बाल कल्याण योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू नहीं कर सकता।

याचिका में यह घोषणा भी मांगी गई कि धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थान अनुच्छेद 26 के अंतर्गत आते हैं, न कि अनुच्छेद 19(1)(g) या 30(1) के तहत। याचिकाकर्ता का तर्क था कि अनुच्छेद 30 में “अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान” शब्द धर्मनिरपेक्ष या व्यावसायिक शैक्षणिक संस्थानों के लिए हैं, न कि धार्मिक संस्थानों के लिए।

याचिका में यह भी कहा गया कि धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थानों को अनुच्छेद 30 के तहत और समान प्रकृति के गैर-अल्पसंख्यक संस्थानों को अनुच्छेद 26 के तहत रखना अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।