BJP विधायक दुर्गेश्वर लाल के बयान से सियासी घमासान, कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी निशाने पर
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर सत्ताधारी भाजपा के भीतर का टकराव खुलकर सामने आ गया है। इस बार विवाद का केंद्र बने हैं कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी और पुरोला से भाजपा विधायक दुर्गेश्वर लाल।
मंत्री द्वारा दो बार के पूर्व विधायक मालचंद को अपना प्रतिनिधि बनाए जाने के फैसले पर दुर्गेश्वर लाल ने कड़ा ऐतराज जताया है, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।
विधायक दुर्गेश्वर लाल ने इस फैसले को प्रोटोकॉल के खिलाफ बताते हुए सार्वजनिक मंच से कहा कि किसी पूर्व विधायक को कैबिनेट मंत्री का प्रतिनिधि बनाना, उसे “मंत्री का चपरासी” बनाने जैसा है।
उन्होंने कहा कि विधायक या पूर्व विधायक पद का एक सम्मान और तय प्रोटोकॉल होता है। यदि पूर्व विधायक को जिम्मेदारी देनी ही थी तो उसे राज्य मंत्री स्तर का दर्जा मिलना चाहिए था।
अपनी ही सरकार पर सीधा हमला
दुर्गेश्वर लाल का यह बयान सीधे तौर पर उनकी ही सरकार और कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी पर निशाना माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह विवाद केवल प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी और टिकट की दावेदारी की राजनीति भी जुड़ी हुई है।
पुरोला सीट बनी सियासी रणभूमि
पुरोला विधानसभा सीट भाजपा के लिए पहले से ही संवेदनशील मानी जाती है। वर्तमान विधायक दुर्गेश्वर लाल के अलावा पूर्व विधायक मालचंद और एक अन्य नेता राजकुमार भी आगामी चुनाव में टिकट के प्रबल दावेदार बताए जा रहे हैं।
ऐसे में मंत्री द्वारा मालचंद को प्रतिनिधि बनाए जाने को दुर्गेश्वर लाल अपने क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देख रहे हैं।
मालचंद का पलटवार
विवाद बढ़ने के बाद पूर्व विधायक मालचंद ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जब देश का प्रधानमंत्री खुद को चौकीदार और मुख्यमंत्री खुद को सेवक कहते हैं, तो अगर वह चपरासी भी बनते हैं,
तो उन्हें इसमें कोई आपत्ति नहीं है। मालचंद का यह बयान खुद को जनसेवक के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश माना जा रहा है।
कांग्रेस का हमला
इस पूरे विवाद पर कांग्रेस ने भी भाजपा को घेरा है। कांग्रेस विधायक प्रीतम सिंह ने कहा कि यह भाजपा की अंदरूनी कलह का नतीजा है। उनके अनुसार, भाजपा नेता जनता के मुद्दों पर काम करने के बजाय पद और टिकट की लड़ाई में उलझे हुए हैं।
संगठन की बढ़ी मुश्किलें
सार्वजनिक मंच पर भाजपा नेताओं की आपसी बयानबाजी ने संगठन की परेशानी बढ़ा दी है। एक तरफ पार्टी अनुशासन पर सवाल उठ रहे हैं,
तो दूसरी ओर चुनाव से पहले भीतरघात की आशंका भी गहराती नजर आ रही है। राजनीतिक संकेत साफ हैं कि उत्तरकाशी और पुरोला की राजनीति में आने वाले दिनों में सियासी संग्राम और तेज हो सकता है।



