निजी स्कूलों में 25% मुफ्त प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट सख़्त, राज्यों को नियम बनाने का आदेश
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) की धारा 12(1)(c) को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि निजी गैर-अनुदानित स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण भारतीय समाज की संरचना को बदलने की असाधारण क्षमता रखता है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने कहा कि यदि इस प्रावधान का ईमानदारी से पालन किया जाए तो यह न केवल बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराने का माध्यम बनेगा, बल्कि संविधान की प्रस्तावना में निहित “स्थिति की समानता” के उद्देश्य को भी साकार करेगा।
‘पड़ोस के स्कूल’ की अवधारणा सामाजिक दीवारें तोड़ने के लिए
जस्टिस नरसिम्हा द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि “पड़ोस के स्कूल” की अवधारणा जाति, वर्ग और लिंग के आधार पर बने सामाजिक विभाजनों को तोड़ने के लिए लाई गई थी। इसका उद्देश्य एक ऐसी साझा विद्यालय प्रणाली विकसित करना है, जहाँ समाज के हर वर्ग के बच्चे एक साथ बैठकर शिक्षा प्राप्त करें।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह व्यवस्था इस बात को संभव बनाती है कि किसी बहु-करोड़पति, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, ऑटो चालक या सड़क किनारे सामान बेचने वाले सभी के बच्चे एक ही कक्षा में पढ़ सकें। यही धारा 12 का असली लोकतांत्रिक और सामाजिक उद्देश्य है।
NCPCR को निगरानी की अहम भूमिका
कोर्ट ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि RTE Act की धारा 31 के तहत आयोग को अधिनियम के कार्यान्वयन की निगरानी का अधिकार है। NCPCR को निर्देश दिया गया है कि वह राज्यों द्वारा बनाए गए नियमों और विनियमों की जानकारी एकत्र कर 31 मार्च तक हलफनामा दाखिल करे।
राज्यों को अधीनस्थ कानून बनाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल दिशानिर्देश पर्याप्त नहीं हैं। धारा 38 के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्पष्ट, लागू करने योग्य नियम और विनियम बनाने होंगे।
कोर्ट ने कहा कि यदि अधीनस्थ कानून नहीं बनाए गए, तो अनुच्छेद 21A और धारा 12(1)(c) की पूरी नीति निरर्थक हो जाएगी और न्यायिक समीक्षा भी जटिल हो जाएगी।
प्रवेश प्रक्रिया के लिए व्यापक सुझाव
कोर्ट ने एमिकस क्यूरी और केंद्र सरकार द्वारा दिए गए संयुक्त सुझावों पर विचार करते हुए प्रवेश प्रक्रिया को पारदर्शी और सुलभ बनाने के लिए कई बिंदुओं को रेखांकित किया, जिनमें प्रमुख हैं-
- सभी राज्यों में सेंट्रलाइज्ड ऑनलाइन पोर्टल
- हिंदी, अंग्रेजी और स्थानीय भाषा में जानकारी
- आवेदन प्रक्रिया के दौरान हेल्प-डेस्क की व्यवस्था
- सीटों की संख्या पहले से सार्वजनिक करना
- त्रुटिपूर्ण आवेदन सुधारने का अवसर
- शिकायत निवारण तंत्र और समय-सीमा
- एडमिशन न देने के कारणों की रिकॉर्डिंग और समीक्षा
- स्कूल स्टाफ को भेदभाव रोकने की ट्रेनिंग
तीन चरणों में SOP
NCPCR की मानक संचालन प्रक्रिया (SoP) को तीन चरणों में बांटा गया है:-
- तैयारी चरण: सीटों का निर्धारण, विज्ञापन, एडमिशन कैलेंडर, दस्तावेज़ और जागरूकता
- आवेदन और चयन चरण: हेल्प-डेस्क, चयन मानदंड, लॉटरी, दस्तावेज़ जांच और विवाद समाधान
- एडमिशन के बाद: निगरानी, प्रतिपूर्ति, समावेशन और अंतिम रिकॉर्ड
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ये दिशानिर्देश अपने आप में लागू करने योग्य कानून नहीं हैं, इसलिए इनके लिए विधिवत नियम बनाना अनिवार्य है।
यह मामला बॉम्बे हाईकोर्ट के 2016 के एक आदेश से उत्पन्न हुआ था, जिसमें एक अभिभावक की याचिका केवल इस आधार पर खारिज कर दी गई थी कि उसने ऑनलाइन प्रक्रिया में 25 प्रतिशत कोटे के तहत आवेदन नहीं किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि व्यक्तिगत राहत अब अप्रासंगिक हो चुकी है, लेकिन भविष्य में ऐसी स्थिति न आए, इसके लिए धारा 12 के क्रियान्वयन की समीक्षा आवश्यक है, मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है।

