क्राइम रिपोर्ट: चार मौतों पर NHAI-PWD पर FIR, केदारताल में छह शव मिले समेत कई बड़ी खबरें, पढ़ें….

चार मौतों पर NHAI-PWD पर FIR, केदारताल में छह शव मिले समेत कई बड़ी खबरें, पढ़ें….

देहरादून। उत्तराखंड में इन दिनों हादसों और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कहीं सड़क की खामियां और भारी वाहनों की अनियंत्रित रफ्तार लोगों की जान ले रही है तो कहीं पहाड़ों में गुलदार और भालू के हमले ग्रामीणों के लिए मुसीबत बन रहे हैं।

उत्तरकाशी के केदारताल ट्रेक पर लापता आठ लोगों में से छह के शव बरामद हो चुके हैं, जबकि दो की तलाश जारी है। वहीं, देहरादून के मोहब्बेवाला में चार लोगों की जान लेने वाले भीषण सड़क हादसे के बाद एनएचएआई और लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।

दूसरी ओर पौड़ी में गुलदार के हमले में चार वर्षीय बच्ची की मौत के बाद ग्रामीणों का आक्रोश वन विभाग के अधिकारियों के साथ टकराव और कानूनी कार्रवाई तक पहुंच गया है।

मोहब्बेवाला हादसा: चार मौतों के बाद NHAI-PWD पर मुकदमा

देहरादून के मोहब्बेवाला में बुधवार को हुए भीषण सड़क हादसे ने एक बार फिर सड़क सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। आशारोड़ी से आईएसबीटी की ओर आने वाले मार्ग पर ट्रेलर के कार के ऊपर पलटने से सहारनपुर के एक ही परिवार के चार लोगों की मौत हो गई थी।

हादसे में छह वर्षीय बच्चा सुरक्षित बच गया, लेकिन उसने अपने माता-पिता और दादी समेत परिवार के तीन सदस्यों और चालक को खो दिया।

मामले में पटेलनगर पुलिस ने आईएसबीटी चौकी प्रभारी की शिकायत पर एनएचएआई और लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है।

शिकायत में सड़क किनारे गड्ढे, चेतावनी बोर्ड की कमी, अपर्याप्त संकेतक, रिफ्लेक्टर और रात में रोशनी की व्यवस्था न होने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

वहीं, मृतक के भाई की शिकायत पर ट्रक चालक के खिलाफ भी गैरइरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है। मामले की विवेचना उपनिरीक्षक मुकेश थलेड़ी को सौंपी गई है।

हैरानी की बात यह है कि जिस स्थान पर हादसा हुआ, वहां दुर्घटना से करीब डेढ़ घंटे पहले ही केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI) और एनएचएआई की टीम निरीक्षण करने पहुंची थी।

इसके बावजूद कुछ ही देर बाद चार लोगों की जान चली गई। हादसे में शामिल कंटेनर के खिलाफ यातायात नियमों के उल्लंघन से संबंधित 25 चालान लंबित होने की बात भी सामने आई है।

मोहब्बेवाला से आशारोड़ी के बीच करीब दो किलोमीटर का हिस्सा पिछले एक साल में 18 बड़ी दुर्घटनाओं का गवाह बन चुका है। रंबल स्ट्रिप, रिफ्लेक्टर, बैरिकेडिंग और निगरानी के इंतजामों के बावजूद हादसे नहीं रुक रहे हैं।

ऐसे में अब सवाल केवल वाहन चालकों की लापरवाही का नहीं, बल्कि सड़क की डिजाइन, ढलान और संबंधित विभागों की जवाबदेही का भी है।

केदारताल ट्रेक हादसा: आठ लापता में छह के शव बरामद

उत्तरकाशी के केदारताल ट्रेक पर प्राकृतिक आपदा ने आठ लोगों की जान ले ली। 27 अक्टूबर को गंगोत्री से 13 सदस्यीय दल ट्रेकिंग के लिए रवाना हुआ था।

दल में सात ट्रेकर्स, एक स्थानीय गाइड, दो कुक और तीन पोर्टर शामिल थे। अचानक मौसम खराब होने और बर्फबारी के कारण दल के आठ सदस्य एवलॉन्च और लैंडस्लाइड की चपेट में आ गए।

सर्च एंड रेस्क्यू अभियान के दौरान 3 नवंबर को एक महिला और एक पुरुष के शव बरामद हुए। 4 नवंबर को दो और शव मिले, जबकि 5 नवंबर को दो अन्य शव बरामद किए गए। इस तरह अब तक छह लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और दो की तलाश जारी है।

बरामद शवों में से चार की पहचान हो चुकी है। इनमें पश्चिम बंगाल के रिंटू मंडल और उदय घोष तथा उत्तर प्रदेश की सगी बहनें वर्तिका वर्मा और दीपिका वर्मा शामिल हैं। शेष दो शवों की पहचान की प्रक्रिया जारी है।

एनडीआरएफ, वन विभाग, एसडीआरएफ और जिला प्रशासन की टीमें चुनौतीपूर्ण मौसम और दुर्गम परिस्थितियों के बीच अभियान चला रही हैं। इस हादसे ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में ट्रेकिंग के दौरान मौसम की अनिश्चितता और सुरक्षा इंतजामों को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

पौड़ी में गुलदार के हमले के बाद वन विभाग और कांग्रेस नेता आमने-सामने

पौड़ी जिले के खांड्यूसैंण क्षेत्र के वजली गांव में गुलदार के हमले में चार वर्षीय आरुषि की मौत के बाद ग्रामीणों का आक्रोश लगातार बढ़ रहा है। घर के आंगन में खेल रही बच्ची को गुलदार उठाकर ले गया था। बाद में उसका शव घर से कुछ दूरी पर बरामद हुआ।

इस घटना के बाद ग्रामीणों ने स्थानीय विधायक राजकुमार पोरी का घेराव किया और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। प्रदर्शन के दौरान अधिकारियों को भी विरोध का सामना करना पड़ा।

ग्रामीणों ने वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को एक कमरे में बंद कर दिया था। डीएफओ के साथ कथित मारपीट और अभद्रता के आरोप भी सामने आए।

मामले में गढ़वाल वन प्रभाग के डीएफओ की शिकायत पर कांग्रेस नेता विनोद दनोशी समेत अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। वहीं, वन विभाग के कर्मचारियों के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार के विरोध में उत्तरांचल फॉरेस्ट मिनिस्ट्रियल संगठन ने कार्य बहिष्कार की चेतावनी दी है।

संगठन ने 18 नवंबर तक उचित कार्रवाई नहीं होने पर पूर्ण कार्य बहिष्कार की चेतावनी दी है। दूसरी ओर कांग्रेस नेता विनोद दनोशी ने आरोपों को राजनीतिक कार्रवाई बताते हुए कहा कि वह वन्यजीवों के हमलों और आम जनता की सुरक्षा का मुद्दा उठाते रहेंगे।

पहाड़ से मैदान तक वन्यजीवों का आतंक

उत्तराखंड में सर्दियों की दस्तक के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ती दिखाई दे रही हैं। पौड़ी में गुलदार के हमलों ने लोगों को दहशत में डाल रखा है।

पिछले एक साल में पौड़ी जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर के दायरे में स्थित गांवों में गुलदार के हमलों की लगभग 15 घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें 12 लोगों की जान जा चुकी है।

पौड़ी की घटना के बाद कोटद्वार क्षेत्र से भी गुलदार के एक बच्ची पर हमले की खबर सामने आई। हालांकि बच्ची की मां ने साहस दिखाते हुए उसे गुलदार के चंगुल से बचा लिया।

चमोली जिले में भालुओं की सक्रियता भी ग्रामीणों और पशुपालकों के लिए परेशानी बन रही है। पोखरी विकासखंड के एरोली, भिकोना और बंगथल गांवों में भालुओं ने गौशालाओं में घुसकर मवेशियों पर हमले किए हैं। कई बैलों की मौत हो चुकी है, जबकि कुछ घायल हुए हैं।

केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग के अनुसार पिछले वर्ष करीब 40 मवेशियों की मौत भालुओं के हमलों में हुई थी, जबकि इस वर्ष अब तक 15 मवेशियों के मारे जाने की जानकारी सामने आई है।

वन विभाग भालुओं की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए रेडियो कॉलर और ड्रोन जैसी तकनीक के इस्तेमाल की योजना पर काम कर रहा है।

हरिद्वार में आबादी की ओर बढ़ रहे हाथियों के झुंड

पहाड़ों में गुलदार और भालुओं के हमलों के बीच मैदानी जिले हरिद्वार में हाथियों की आवाजाही ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। भेल स्टेडियम, गोल चौराहा और लालढांग क्षेत्र में हाथियों के झुंड रिहायशी इलाकों और सड़कों तक पहुंच रहे हैं।

हरिद्वार वन प्रभाग के अनुसार करीब 16 से 17 हाथी ऐसे हैं, जो आबादी वाले क्षेत्रों में आवाजाही करते हैं। इनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए छह हाथियों को रेडियो कॉलर पहनाने की योजना बनाई गई है। इसके अलावा मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए 75 हाथी मित्रों की तैनाती का प्रस्ताव भी तैयार किया गया है।

नैनीताल बोट हाउस क्लब में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप

नैनीताल के प्रतिष्ठित बोट हाउस क्लब में भी प्रबंधन व्यवस्था को लेकर विवाद सामने आया है। क्लब के कुछ सदस्यों ने वर्तमान और पूर्व प्रबंधन पदाधिकारियों पर वित्तीय अनियमितताओं तथा सदस्यता नियमों के उल्लंघन के आरोप लगाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।

पूर्व डायरेक्टर पंकज जैसवाल, बलजीत सिंह और शादाब अहमद ने प्रेस वार्ता कर आरोप लगाया कि निर्धारित सदस्यता शुल्क से कम धनराशि लेकर कुछ लोगों को बैकडेट में सदस्यता दी गई।

सदस्यों ने पांच बिंदुओं पर जांच की मांग करते हुए दोषी पाए जाने वाले पदाधिकारियों को क्लब की चुनावी प्रक्रिया और प्रबंधन से प्रतिबंधित करने की मांग की है।

हालांकि क्लब के एडमिनिस्ट्रेटर जीबी जोशी ने आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि 11 जुलाई 2024 को सदस्यता शुल्क तीन लाख पांच हजार रुपये था, जबकि 12 जुलाई को इसे बढ़ाकर छह लाख रुपये कर दिया गया था।

जिन रसीदों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, वे 11 जुलाई को ही जारी की गई थीं। उन्होंने इसे चुनावी माहौल में लगाए जा रहे आरोप बताया।

पटाखा कारोबारियों पर राज्य कर विभाग की कार्रवाई, 90 लाख रुपये जमा

त्योहारी सीजन में कर चोरी रोकने के लिए राज्य कर विभाग ने कुमाऊं मंडल में पटाखा कारोबारियों के प्रतिष्ठानों पर एक साथ जांच अभियान चलाया।

काशीपुर, रुद्रपुर और किच्छा में पांच टीमों ने प्रतिष्ठानों पर पहुंचकर खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड, स्टॉक और व्यावसायिक दस्तावेजों की जांच की।

राज्य कर आयुक्त प्रतीक जैन के निर्देश पर चलाए गए इस अभियान में कुल 90 लाख रुपये जमा कराए गए। कार्रवाई अपर आयुक्त रुद्रपुर राकेश वर्मा के निर्देशन में की गई।

हालांकि विभागीय प्रेस विज्ञप्ति में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि जमा कराई गई धनराशि किस मद में जमा हुई है। जांच में सामने आई अनियमितताओं और संबंधित कारोबारियों के नामों का भी खुलासा नहीं किया गया है।

सुरक्षा और जवाबदेही सबसे बड़ा सवाल

उत्तराखंड में एक के बाद एक सामने आ रही घटनाएं कई स्तरों पर व्यवस्था की परीक्षा ले रही हैं। मोहब्बेवाला में सड़क सुरक्षा के इंतजामों पर सवाल हैं तो केदारताल में दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में बचाव अभियान की चुनौतियां सामने हैं।

पौड़ी, चमोली और हरिद्वार में वन्यजीवों की बढ़ती गतिविधियां ग्रामीणों की सुरक्षा और आजीविका दोनों को प्रभावित कर रही हैं।

सरकार ने मानव-वन्यजीव संघर्ष को आपदा के रूप में मान्यता देने और जिला स्तर पर न्यूनीकरण एवं प्रबंधन समितियां गठित करने का निर्णय लिया है। लेकिन जमीनी स्तर पर इन फैसलों का प्रभाव कितना दिखाई देता है, यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।

अब जरूरत केवल हादसों के बाद जांच, मुकदमे और मुआवजे तक सीमित रहने की नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं और वन्यजीवों के हमलों को रोकने के लिए स्थायी एवं प्रभावी व्यवस्था बनाने की है।

आखिर सड़क हो या जंगल से सटे गांव, आम आदमी की जान की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है और जवाबदेही कब तय होगी?