हाईकोर्ट शिफ्टिंग पर वन भूमि का विवाद, खनन नियमों पर भी सरकार से जवाब तलब
नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में शुक्रवार को दो महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई हुई। एक ओर उच्च न्यायालय को नैनीताल से स्थानांतरित करने के लिए प्रस्तावित भूमि को लेकर वन संरक्षण कानून, हाथी कॉरिडोर और पर्वतीय क्षेत्र से संस्थान हटाने का मुद्दा उठा।
वहीं दूसरी ओर निजी कंपनी से खनन रॉयल्टी वसूलने और बिना टेंडर खनन पट्टे देने संबंधी नियमावली पर राज्य सरकार से तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा गया।
उच्च न्यायालय के अधिवक्ता एवं राज्य आंदोलनकारी रमन शाह की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया कि जिलाधिकारी नैनीताल की रिपोर्ट में उच्च न्यायालय को बेलबाबा मंदिर के पास रिजर्व फॉरेस्ट की भूमि पर स्थानांतरित करने की बात कही गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह प्रस्ताव वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की धारा-2 के प्रावधानों के विपरीत है।
याचिका में यह भी कहा गया कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ कानून के उल्लंघन के मामले में कार्रवाई की जानी चाहिए। याचिकाकर्ता के अनुसार, जिलाधिकारी ने उस समय भूमि हस्तांतरण का प्रस्ताव तैयार किया, जब इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की ओर से रोक प्रभावी थी।
सवाल उठाया गया कि जब सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के लिए भूमि को “जहां है, जिस हालत में है” के आधार पर सौंपने की बात कही थी तो प्रशासन ने रिजर्व फॉरेस्ट की भूमि को ही क्यों चिन्हित किया।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि प्रस्तावित क्षेत्र हाथी कॉरिडोर का हिस्सा है और वहां बड़े स्तर पर पौधरोपण किया जा चुका है। अधिवक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड पर्वतीय अवधारणा के आधार पर बना राज्य है और राज्य आंदोलन में अनेक लोगों ने बलिदान दिया।
ऐसे में प्रदेश के प्रमुख संस्थान को पहाड़ से मैदान में स्थानांतरित करने के औचित्य पर सवाल उठाया गया। उनका कहना था कि यदि उच्च न्यायालय को स्थानांतरित करना ही है तो इसके लिए पर्वतीय क्षेत्र में ही उपयुक्त भूमि तलाश की जानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि मामले में आगे की प्रक्रिया चल रही है और जिस स्थान पर न्यायालय को स्थानांतरित करने का प्रस्ताव है, वह हाथी कॉरिडोर नहीं है।
अधिवक्ताओं ने यह मुद्दा भी उठाया कि सर्वोच्च न्यायालय के 15 जुलाई 2026 के आदेश से भूमि का वन स्वरूप समाप्त नहीं हो जाता।
याचिकाकर्ता के अनुसार, यह रिजर्व फॉरेस्ट भूमि है और उत्तराखंड सरकार की 12 अगस्त 2026 की अधिसूचना में भी इसे वन भूमि के रूप में दर्ज किया गया है। दलील दी गई कि वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत रिजर्व फॉरेस्ट भूमि को डी-रिजर्व करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।
उच्च न्यायालय के स्थानांतरण का विरोध कर रहे
अधिवक्ताओं ने यह भी सवाल उठाया कि जब मामले में स्टे प्रभावी था तो जिलाधिकारी ने मई 2026 में किस आधार पर उक्त भूमि को न्यायालय के लिए हस्तांतरित करने का प्रस्ताव तैयार किया। उन्होंने इस मामले में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
साथ ही कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने नैनीताल जिले में उपलब्ध उपयुक्त भूमि पर विचार करने की बात कही थी, लेकिन सरकार केवल हल्द्वानी में ही न्यायालय स्थानांतरित करने पर क्यों विचार कर रही है, जबकि अन्य स्थानों पर भी भूमि उपलब्ध हो सकती है।
इधर, उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड में खनन रॉयल्टी वसूली का काम निजी कंपनी को देने और कुछ खनन पट्टों को बिना टेंडर प्रक्रिया के आवंटित करने संबंधी नियमावली को चुनौती देने वाली याचिका पर भी सुनवाई की।
न्यायालय ने राज्य सरकार को तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल कर यह बताने को कहा है कि पूर्व की सुनवाई में दिए गए निर्देशों के क्रम में अब तक क्या कार्रवाई की गई है। मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद होगी।
याचिकाकर्ता संतोष सिंह हर्नवाल की ओर से अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने न्यायालय को बताया कि राज्य सरकार ने खनिज परिवहन नियमों में संशोधन कर रॉयल्टी वसूली का कार्य निजी हाथों में सौंपने का प्रावधान किया है।
इसके अलावा टेंडर प्रक्रिया में सबसे कम बोली लगाने वाली एल-1 कंपनी को खाली पड़े खनन पट्टों का काम सौंपने का प्रावधान भी किया गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि रॉयल्टी वसूलना राज्य का संवैधानिक दायित्व है और इसे निजी कंपनी को सौंपना राज्यहित के विपरीत है।
यह भी कहा गया कि न्यायालय ने पूर्व में राज्य सरकार को खनन के लिए अलग कॉरपोरेशन बनाने पर विचार करने के निर्देश दिए थे, लेकिन इस दिशा में अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।


