RTI से खुली नैनीताल पुलिस की रिकॉर्ड व्यवस्था की पोल, कई थानों ने देने से किया इंकार
- आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत सिंह गौनिया ने रिकॉर्ड प्रबंधन और पारदर्शिता पर उठाए सवाल, सूचना आयोग और न्यायालय जाने की दी चेतावनी
नैनीताल। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के तहत आरटीआई कार्यकर्ता एवं समाजसेवी हेमंत सिंह गौनिया द्वारा दायर आवेदन में नैनीताल पुलिस की रिकॉर्ड व्यवस्था को लेकर कई अहम तथ्य सामने आए हैं।
वर्ष 2016 से 2026 तक अपराधियों और नशा तस्करों की कुर्क की गई संपत्तियों से संबंधित जानकारी मांगने पर जिले के विभिन्न थानों से अलग-अलग और विरोधाभासी जवाब मिले हैं।
आरटीआई आवेदन में 10 वर्षों के दौरान की गई कुर्कियों का वर्षवार विवरण, संपत्तियों का मूल्य, संबंधित मुकदमे, न्यायालय के आदेश, संपत्तियों की वर्तमान स्थिति, ऑनलाइन प्रकाशन और अन्य अभिलेखों सहित 10 बिंदुओं पर विस्तृत जानकारी मांगी गई थी।
लोक सूचना अधिकारी ने विभिन्न थानों से सूचना एकत्र कर उपलब्ध कराई, लेकिन जवाबों में भारी असमानता देखने को मिली।
कई थानों ने पूरे 10 वर्षों में एक भी कुर्की नहीं होने की जानकारी देते हुए “शून्य सूचना” भेज दी, जबकि कुछ थानों ने केवल एक-दो मामलों का उल्लेख किया। कई स्थानों पर केवल मुकदमा संख्या बताई गई, लेकिन उससे संबंधित अभिलेख उपलब्ध नहीं कराए गए।
अनेक थानों ने संपत्ति का विवरण, वर्तमान स्थिति और अन्य रिकॉर्ड देने से सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8 का हवाला देकर इंकार कर दिया। कुछ मामलों में यह भी बताया गया कि संबंधित अभिलेख न्यायालय में जमा हैं।
आरटीआई से यह भी सामने आया कि अधिकांश थानों ने कुर्क की गई संपत्तियों का ऑनलाइन प्रकाशन नहीं किया है। कई मामलों में संपत्ति का मूल्य, कुर्की आदेश और कार्रवाई से जुड़े महत्वपूर्ण रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं कराए गए।
आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत सिंह गौनिया ने कहा कि यदि जनपद में कुर्की की कार्रवाई हुई है तो उसका डिजिटल और पारदर्शी रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए। अलग-अलग थानों से अलग-अलग प्रकार के उत्तर मिलने से रिकॉर्ड प्रबंधन और सूचना उपलब्ध कराने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
उन्होंने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य नागरिकों को पूर्ण, प्रमाणित और बिंदुवार सूचना उपलब्ध कराना है, न कि अधूरी जानकारी देकर या धारा 8 का अनावश्यक उपयोग कर सूचना को सीमित करना।
हेमंत सिंह गौनिया ने बताया कि प्राप्त उत्तरों का विधिक परीक्षण कराया जाएगा। यदि कहीं सूचना अधूरी, भ्रामक या नियमों के विपरीत पाई गई तो संबंधित मामलों में प्रथम अपील, उत्तराखंड सूचना आयोग में द्वितीय अपील तथा आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा।
उन्होंने कहा, “सूचना का अधिकार लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना हर लोक प्राधिकरण का वैधानिक दायित्व है।”


