Justice Unplugged 2026’ में बोले सिब्बल, क्या न्यायपालिका पर अविश्वास का पाठ पढ़ाया जा रहा है?
नई दिल्ली। सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने हाल ही में एनसीईआरटी की कक्षा 8 की पुस्तक में शामिल ‘ज्यूडिशियरी में करप्शन’ संबंधी अध्याय को लेकर गंभीर आपत्ति जताई।
उनका कहना है कि युवाओं को समाज में भ्रष्टाचार के बारे में शिक्षित करना आवश्यक है, लेकिन किसी एक संस्थान-विशेषकर न्यायपालिका को अलग से चिन्हित करना उचित नहीं है।
वे VIT School of Law और The Hindu Group द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘Justice Unplugged 2026’ में बोल रहे थे। इस चर्चा का विषय था “Constitutional Morality and the Supreme Court of India: Has the Court moved from Constitutionalism to Pragmatism?”
‘करप्शन है, लेकिन सिर्फ ज्यूडिशियरी को क्यों?’
सिब्बल ने कहा कि, “हर संस्थान में कुछ गलत लोग होते हैं। इसलिए यह कहना कि कहीं भ्रष्टाचार नहीं है, सही नहीं होगा। लेकिन सवाल यह है कि यह विषय अचानक कक्षा 8 की किताब में क्यों आया?”
उनका तर्क था कि यदि न्यायपालिका ने “कॉन्स्टिट्यूशनल मोरैलिटी” के अनुरूप अपनी भूमिका निभाई होती, तो शायद ऐसी स्थिति पैदा ही न होती कि बच्चों को पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका को भ्रष्ट के रूप में पढ़ाया जाए।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश और सिब्बल का समर्थन
हाल ही में Supreme Court of India ने एनसीईआरटी अधिकारियों के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए टिप्पणी की कि यह न्यायपालिका को बदनाम करने का प्रयास है। कोर्ट ने पुस्तक की सभी हार्ड कॉपी ज़ब्त करने और सॉफ्ट कॉपी हटाने का आदेश दिया।
सिब्बल ने इस निर्णय का समर्थन करते हुए कहा कि बच्चों के मन में यह धारणा नहीं बैठनी चाहिए कि “जज करप्ट हैं”, क्योंकि इससे समाज में न्याय के प्रति विश्वास कमजोर होगा।
‘कॉन्स्टिट्यूशनल मोरैलिटी खत्म हो रही है’
सिब्बल ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) एक गतिशील अवधारणा है, लेकिन वर्तमान समय में यह सार्वजनिक जीवन से समाप्त होती दिख रही है।
उन्होंने विशेष रूप से अनुच्छेद 32 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह स्वयं एक मौलिक अधिकार है, और जब नागरिक सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका लाते हैं तो मामलों को बार-बार हाई कोर्ट भेजना उचित नहीं।
उनका आरोप था कि:
- मंत्रियों के कथित सांप्रदायिक भाषणों पर कोर्ट स्वतः संज्ञान नहीं लेता
- छात्र नेताओं की गिरफ्तारी के मामलों में सक्रियता नहीं दिखती
- जांच एजेंसियों का दुरुपयोग हो रहा है
उन्होंने Enforcement Directorate, PMLA और UAPA जैसे कानूनों के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए।
‘2014 के बाद असहिष्णुता बढ़ी’
सिब्बल ने कहा कि भारत में असहिष्णुता पहले भी रही है, लेकिन 2014 के बाद इसका स्तर बढ़ा है। उन्होंने दावा किया कि अधिकांश संस्थानों पर “कब्ज़ा” हो चुका है और न्यायपालिका ही एकमात्र ऐसा संस्थान है जिस पर पूर्ण नियंत्रण नहीं है।
उन्होंने कहा कि, “अगर बच्चे इस सोच के साथ बड़े होंगे कि न्यायपालिका करप्ट है, तो समाज के रूप में हम कहां पहुंचेंगे?”
‘कॉलोनियल माइंडसेट’ पर टिप्पणी
दिल्ली शराब घोटाला मामले का जिक्र करते हुए सिब्बल ने कहा कि औपनिवेशिक मानसिकता आज भी कानून व्यवस्था में मौजूद है। जहां पहले गिरफ्तारी होती है और बाद में सबूत जुटाए जाते हैं। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक बताया।
कपिल सिब्बल के वक्तव्य ने शिक्षा, न्यायपालिका की छवि, संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत संतुलन जैसे मुद्दों पर नई बहस छेड़ दी है। उनका मूल तर्क यह है कि भ्रष्टाचार के विषय को समग्र सामाजिक संदर्भ में पढ़ाया जाना चाहिए, न कि किसी एक संस्था को केंद्र में रखकर।



