खास खबर: अंकिता केस में VIP का सवाल बरकरार, नियुक्ति पर बवाल और उत्तराखंड में सियासी भूचाल

अंकिता केस में VIP का सवाल बरकरार, नियुक्ति पर बवाल और उत्तराखंड में सियासी भूचाल

देहरादून। अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर उत्तराखंड की सियासत के केंद्र में है। करीब चार साल पहले हुए इस हत्याकांड में तीन दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है, लेकिन कथित VIP की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों ने मामले को फिर गरमा दिया है।

कथित VIP के सिक्किम के राज्यपाल पद पर नियुक्त होने के बाद कांग्रेस ने भाजपा सरकार को घेरते हुए न्याय की लड़ाई तेज कर दी है।

दिल्ली के इंडिया गेट पर अंकिता के माता-पिता का धरना, राहुल गांधी का राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र और देहरादून में कांग्रेस का प्रदर्शन इस पूरे घटनाक्रम को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस में ले आए हैं।

अब सवाल उठ रहा है कि यह आंदोलन अंकिता को न्याय दिलाने की गंभीर लड़ाई है या आगामी विधानसभा चुनाव से पहले तेज होती सियासी जंग का हिस्सा?

इंडिया गेट से लोकभवन तक गूंजा न्याय का सवाल

14 अक्टूबर की शाम अंकिता भंडारी के माता-पिता दिल्ली के इंडिया गेट पर न्याय की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए। परिवार का कहना था कि कथित VIP की भूमिका को लेकर सीबीआई जांच अभी पूरी नहीं हुई है, ऐसे में संबंधित व्यक्ति की राज्यपाल पद पर नियुक्ति ने उनकी चिंताएं बढ़ा दी हैं।

अंकिता के पिता वीरेंद्र सिंह भंडारी और मां सोनी देवी ने राष्ट्रपति से हस्तक्षेप करने तथा नियुक्ति पर पुनर्विचार की अपील की।

धरने की जानकारी मिलने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी भी अंकिता के माता-पिता से मिलने पहुंचे। इसके बाद पार्टी के अन्य नेता और कार्यकर्ता भी धरनास्थल पर जुटने लगे। 15 अक्टूबर की सुबह करीब चार बजे दिल्ली पुलिस ने अंकिता के परिजनों को धरने से हटाकर हिरासत में ले लिया।

इस कार्रवाई के बाद कांग्रेस ने सरकार पर पीड़ित परिवार की आवाज दबाने का आरोप लगाया। पार्टी का कहना है कि न्याय की गुहार लगा रहे माता-पिता के साथ संवेदनशीलता से पेश आने के बजाय उन्हें हिरासत में लेना दुर्भाग्यपूर्ण है।

दिल्ली में हुए घटनाक्रम का असर उत्तराखंड की राजनीति पर भी दिखाई दिया। कांग्रेस ने देहरादून में प्रदर्शन कर सरकार से कथित VIP की भूमिका पर जवाब देने और नियुक्ति पर पुनर्विचार करने की मांग उठाई।

राहुल गांधी का राष्ट्रपति को पत्र, नियुक्ति पर पुनर्विचार की मांग

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर कथित VIP की नियुक्ति पर पुनर्विचार करने की अपील की है।

राहुल गांधी ने कहा कि 19 वर्षीय अंकिता ने कथित तौर पर VIP मेहमानों को विशेष सेवाएं देने के दबाव के आगे झुकने से इनकार किया था और इसके बाद उसकी हत्या कर दी गई।

इस मामले में पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को अदालत ने दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, लेकिन कथित VIP की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब अब तक सामने नहीं आया है।

राहुल गांधी ने अपने पत्र में दुष्यंत गौतम का नाम लेते हुए उनकी कथित भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों का उल्लेख किया और नियुक्ति पर पुनर्विचार का अनुरोध किया।

हालांकि, किसी व्यक्ति का नाम चर्चा में आने या उसके खिलाफ आरोप लगाए जाने मात्र से अपराध में उसकी संलिप्तता साबित नहीं होती। इस मामले में संबंधित भूमिका और आरोपों का निर्धारण जांच तथा कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

राहुल गांधी का तर्क है कि जांच पूरी होने से पहले नियुक्ति होने से निष्पक्ष जांच को लेकर सवाल उठ सकते हैं। उन्होंने राष्ट्रपति से अनुरोध किया कि सरकार को इस फैसले पर पुनर्विचार करने और जांच पूरी होने तक संबंधित व्यक्ति को पदभार नहीं संभालने देने की सलाह दी जाए। कांग्रेस ने इसे महिला सुरक्षा, न्याय और संवैधानिक जवाबदेही से जुड़ा मुद्दा बताया है।

कथित VIP का नाम सामने आने के बाद फिर क्यों गरमाया मामला?

अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित VIP का मुद्दा दिसंबर 2025 में उस समय फिर चर्चा में आया, जब उत्तराखंड भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर की पत्नी उर्मिला सनावर ने सोशल मीडिया पर एक ऑडियो साझा किया।

यह ऑडियो सुरेश राठौर के साथ बातचीत से जुड़ा बताया गया। उर्मिला सनावर ने दावा किया कि इसमें भाजपा संगठन से जुड़े एक व्यक्ति का उल्लेख है। इसके बाद प्रदेश में प्रदर्शन शुरू हुए और कथित VIP की भूमिका की जांच की मांग तेज हो गई।

बढ़ते जनाक्रोश के बीच जनवरी 2026 में राज्य सरकार ने मामले की सीबीआई जांच की संस्तुति की। अब अंकिता के माता-पिता और विपक्ष का सवाल है कि जब कथित VIP की भूमिका की जांच की जा रही है, तो संबंधित व्यक्ति की राज्यपाल पद पर नियुक्ति क्यों की गई? कांग्रेस का आरोप है कि इस फैसले से जांच की निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा हो सकते हैं।

दूसरी ओर, इस मामले में आरोपों और तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना भी जरूरी है। कथित VIP की भूमिका को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच के नतीजों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही सामने आना चाहिए।

देहरादून में कांग्रेस का प्रदर्शन, नेताओं को हिरासत में लिया

दिल्ली में अंकिता के माता-पिता को हिरासत में लिए जाने के विरोध में 15 अक्टूबर को उत्तराखंड कांग्रेस ने देहरादून में प्रदर्शन किया।

प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हरक सिंह रावत और चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने संयुक्त प्रेस वार्ता की। इसके बाद कांग्रेस नेता न्याय की मांग को लेकर लोकभवन पहुंचे और प्रदर्शन शुरू कर दिया।

कांग्रेस नेताओं ने नारेबाजी करते हुए सरकार से कथित VIP की भूमिका पर जवाब देने और नियुक्ति पर पुनर्विचार करने की मांग की। पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे नेताओं को हिरासत में लेकर पुलिस लाइन भेज दिया।

कांग्रेस नेताओं का कहना था कि वे ज्ञापन सौंपने पहुंचे थे, लेकिन उनकी मांगों पर सुनवाई नहीं हुई। इस दौरान हरक सिंह रावत ने आत्मदाह की धमकी भी दी, जिससे प्रदर्शन ने और आक्रामक रूप ले लिया।

प्रदेश कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि अंकिता को न्याय दिलाने और मामले से जुड़े सवालों के जवाब मिलने तक आंदोलन जारी रहेगा।

गणेश गोदियाल और हरीश रावत ने भाजपा पर साधा निशाना

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भाजपा पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि पार्टी ने शुरुआत से ही VIP के सवाल पर जनता को स्पष्ट जवाब नहीं दिया।

उन्होंने कहा कि कथित VIP की भूमिका की जांच के बीच राज्यपाल पद पर नियुक्ति का फैसला उत्तराखंड के स्वाभिमान और मातृशक्ति के सम्मान से जुड़ा सवाल बन गया है। गोदियाल ने मांग की कि जांच पारदर्शी तरीके से हो और जनता के सामने सभी तथ्यों को रखा जाए।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अंकिता हत्याकांड को उत्तराखंड की अस्मिता से जुड़ा मामला बताया। उन्होंने कहा कि अंकिता के माता-पिता अपनी बेटी के लिए न्याय मांगने दिल्ली पहुंचे थे, लेकिन उन्हें हिरासत में ले लिया गया।

रावत के मुताबिक, यह लड़ाई केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की है। उन्होंने सवाल उठाया कि कथित VIP की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब कब मिलेगा।

प्रीतम सिंह ने भी मामले में कथित VIP की भूमिका स्पष्ट करने की मांग की। वहीं, हरक सिंह रावत ने भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अंकिता के परिवार को न्याय दिलाने के लिए प्रदेश की जनता को आगे आना चाहिए। कांग्रेस नेताओं के इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष जांच के तथ्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

पुलिस ने गिनाईं जांच की उपलब्धियां, तीनों दोषी जेल में

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच उत्तराखंड पुलिस ने अंकिता भंडारी हत्याकांड की जांच और न्यायिक कार्यवाही को लेकर अपना पक्ष रखा। अपर पुलिस महानिदेशक वी. मुरुगेशन ने बताया कि घटना सामने आने के 24 घंटे के भीतर तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया था।

मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष जांच दल यानी एसआईटी का गठन किया गया, जिसकी अध्यक्षता डीआईजी स्तर की महिला आईपीएस अधिकारी ने की।

पुलिस के अनुसार, एसआईटी ने डिजिटल, तकनीकी, फॉरेंसिक और भौतिक साक्ष्यों के साथ गवाहों के बयानों का विश्लेषण किया। जांच पूरी करने के बाद लगभग 500 पृष्ठों का आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया गया।

30 मई 2025 को कोटद्वार की अदालत ने पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को दोषी ठहराते हुए आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई। तीनों दोषी वर्तमान में जेल में बंद हैं।

हालांकि, मौजूदा विवाद का केंद्र दोषियों को मिली सजा नहीं, बल्कि कथित VIP की भूमिका से जुड़े वे सवाल हैं, जिनके जवाब परिवार और विपक्ष मांग रहे हैं।

यही वजह है कि पुलिस की ओर से जांच की उपलब्धियां गिनाए जाने के बावजूद राजनीतिक विवाद थमता नजर नहीं आ रहा।

2027 चुनाव से पहले भाजपा के लिए चुनौती?

उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस इस मामले के जरिए भाजपा सरकार को घेर रही है, जबकि सरकार के सामने जांच की निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देने की चुनौती है।

खासकर गढ़वाल क्षेत्र में यह मुद्दा जनभावनाओं को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि अंकिता की हत्या ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक अहम सवाल यह भी है कि क्या राजनीतिक दल अंकिता को न्याय दिलाने के मुद्दे को चुनावी आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर रख पाएंगे? यदि कांग्रेस के आरोप हैं, तो उनका जवाब तथ्यों के आधार पर सामने आना चाहिए।

यदि परिवार की आशंकाएं हैं, तो जांच में उनका निष्पक्ष समाधान होना चाहिए। और यदि नियुक्ति को लेकर संवैधानिक सवाल उठ रहे हैं, तो उन पर भी कानून के दायरे में स्पष्टता जरूरी है।

अंकिता भंडारी हत्याकांड में न्याय की मांग को केवल चुनावी शगूफा कहकर खारिज करना भी जल्दबाजी होगी और हर आरोप को प्रमाणित तथ्य मान लेना भी उचित नहीं।

असली कसौटी यह है कि सीबीआई जांच कितनी निष्पक्षता और पारदर्शिता से आगे बढ़ती है, कथित VIP की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों का क्या जवाब मिलता है और अंकिता के परिवार को न्याय की प्रक्रिया पर कितना भरोसा मिल पाता है।

उत्तराखंड की जनता अब केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि ठोस जवाब और निष्पक्ष कार्रवाई देखना चाहती है।