खास खबर: कहीं बच्चों के लिए खुले शिक्षा के नए द्वार, तो कहीं शिक्षकों की कमी से जूझ रहे विद्यालय

कहीं बच्चों के लिए खुले शिक्षा के नए द्वार, तो कहीं शिक्षकों की कमी से जूझ रहे विद्यालय

देहरादून। उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था की दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आई हैं। एक ओर नैनीताल जिले में समाजसेवी और शिक्षकों की पहल से सैकड़ों गरीब बच्चों तक शिक्षा पहुंच रही है।

वहीं दूसरी ओर कई सरकारी विद्यालय शिक्षक संकट से जूझ रहे हैं, जिसके चलते छात्राओं और ग्रामीणों को सड़क पर उतरकर आवाज उठानी पड़ रही है।

नैनीताल जिले में नवेंदु मठपाल की पहल पर संचालित सायंकालीन विद्यालय आज शिक्षा से वंचित बच्चों के लिए उम्मीद की किरण बन चुके हैं।

ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के विचारों से प्रेरित इस अभियान के तहत तीन विद्यालयों में 400 से अधिक बच्चों को शिक्षा दी जा रही है। स्थानीय युवा और शिक्षक स्वयंसेवी रूप से बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा संभाल रहे हैं।

सायंकालीन विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षक सुमित बताते हैं कि वर्ष 2021 में कोसी नदी की बाढ़ के दौरान उनका परिचय नवेंदु मठपाल से हुआ था। उस समय वे बीएससी के छात्र थे और इसी अभियान से जुड़ने के बाद उन्होंने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।

आज वे एमएससी फिजिक्स पूरी कर चुके हैं और जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा देना अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं।

विद्यालय से जुड़ी शिक्षिकाओं वंदना और ऋतु बेलवाल का कहना है कि यहां बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ खेल, नृत्य और अन्य रचनात्मक गतिविधियों में भी भाग लेने का अवसर मिलता है।

विद्यालय में 100 से अधिक बच्चे नियमित रूप से पढ़ाई करने आते हैं और उनमें सीखने की उत्सुकता लगातार बढ़ रही है। छात्र-छात्राओं का भी कहना है कि यहां कठिन विषयों को सरल तरीके से समझाया जाता है, जिससे उनकी पढ़ाई में काफी सुधार हुआ है।

बेतालघाट की छात्राओं की आवाज बनी बदलाव की वजह

दूसरी ओर नैनीताल जिले के राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, बेतालघाट में वर्षों से शिक्षकों की कमी के कारण छात्राओं की पढ़ाई प्रभावित हो रही थी। इंटर स्तर पर प्रवक्ता के सभी 9 पद और एलटी के 10 में से 5 पद रिक्त होने से छात्राओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा था।

स्थिति से नाराज कक्षा 10, 11 और 12 की छात्राओं ने विद्यालय की छुट्टी के बाद शिव मंदिर परिसर में सांकेतिक प्रदर्शन कर सरकार से “टीचर दो” की मांग उठाई।

सोशल मीडिया पर छात्राओं का वीडियो वायरल होने के बाद शिक्षा विभाग हरकत में आया और विद्यालय में 7 अतिथि शिक्षकों की तैनाती के आदेश जारी कर दिए।

इनमें राजनीति विज्ञान, अंग्रेजी, अर्थशास्त्र और हिंदी विषय के 4 अतिथि प्रवक्ता तथा व्यायाम, विज्ञान और हिंदी विषय के 3 अतिथि सहायक अध्यापक शामिल हैं।

मुख्य शिक्षा अधिकारी नैनीताल के अनुसार सभी शिक्षकों को एक सप्ताह के भीतर कार्यभार ग्रहण करने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था पूरी तरह अस्थायी होगी और नियमित नियुक्ति होने पर स्वतः समाप्त हो जाएगी।

उत्तरकाशी के खन्यासणी विद्यालय में एक शिक्षक के भरोसे 43 बच्चे

शिक्षक संकट की एक और तस्वीर उत्तरकाशी जिले के मोरी विकासखंड के दूरस्थ ग्राम खन्यासणी से सामने आई है। यहां राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में 43 छात्र-छात्राएं केवल एक शिक्षक के भरोसे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि एक शिक्षक को सभी कक्षाओं और विषयों की जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है, जिससे गणित और विज्ञान जैसे विषयों की गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

कक्षा संचालन, मूल्यांकन, गृहकार्य जांच और प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी एक ही शिक्षक पर होने के कारण बच्चों की शिक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

अभिभावकों और ग्रामीणों ने सरकार एवं शिक्षा विभाग से विद्यालय में पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की तैनाती की मांग करते हुए कहा है कि दूरस्थ क्षेत्रों के गरीब बच्चों को भी शहरों के बच्चों की तरह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का समान अवसर मिलना चाहिए।

शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

उत्तराखंड में एक ओर समाज और स्वयंसेवकों की पहल शिक्षा का नया मॉडल प्रस्तुत कर रही है, वहीं दूसरी ओर सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी शिक्षा व्यवस्था की गंभीर चुनौतियों को उजागर कर रही है।

बेतालघाट की छात्राओं का आंदोलन और खन्यासणी के ग्रामीणों की चिंता यह संकेत दे रही है कि शिक्षा के अधिकार को धरातल पर मजबूत करने के लिए रिक्त पदों को शीघ्र भरना और दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षकों की पर्याप्त तैनाती सुनिश्चित करना समय की मांग है।