हल्द्वानी शुद्धिकरण विवाद पर कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन, 7 सितंबर को सीएम आवास घेरेगी पार्टी
देहरादून। हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद हुए कथित ‘शुद्धिकरण’ को लेकर उत्तराखंड की सियासत लगातार गरमा रही है।
कांग्रेस इस मुद्दे को दलित सम्मान, सामाजिक न्याय और संविधान के मूल सिद्धांतों से जोड़कर भाजपा सरकार पर हमलावर है। मंगलवार को सचिवालय कूच के बाद अब कांग्रेस ने 7 सितंबर को मुख्यमंत्री आवास घेराव करने का ऐलान किया है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि सरकार यदि 7 सितंबर से पहले पार्टी की तीन प्रमुख मांगों को मान लेती है तो मुख्यमंत्री आवास घेराव के फैसले पर पुनर्विचार किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि हल्द्वानी में खड़गे की रैली के बाद जिस तरह धार्मिक अनुष्ठान किया गया, उसमें कानून के तहत दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
गोदियाल ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के कथित तौर पर शुद्धिकरण को उचित ठहराने वाले बयानों पर भी सवाल उठाए।
कांग्रेस की मांग है कि पूरे मामले में कानून के तहत कार्रवाई की जाए और कथित शुद्धिकरण को सही ठहराने वाले नेताओं के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज हो।
कांग्रेस की तीसरी प्रमुख मांग राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज मुकदमे को वापस लेने की है। पार्टी का कहना है कि इस पूरे मामले में राहुल गांधी शिकायतकर्ता की भूमिका में हैं, लेकिन उनके खिलाफ ही मुकदमा दर्ज कर दिया गया।
गोदियाल ने कहा कि यदि सरकार तीनों मांगों को स्वीकार नहीं करती है तो कांग्रेस सड़क पर उतरकर आंदोलन को और तेज करेगी।
विवाद कैसे शुरू हुआ?
हल्द्वानी रामलीला मैदान में 8 अगस्त को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली हुई थी। इसके तीन दिन बाद 11 अगस्त को रैली के मंच पर धार्मिक अनुष्ठान किया गया।
यह आयोजन श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास की ओर से कराया गया था। आयोजकों की ओर से इसे धार्मिक आस्था और सफाई से जुड़ा आयोजन बताया गया, जबकि कांग्रेस ने इसे मंच और मैदान के ‘शुद्धिकरण’ के रूप में पेश किया।
कांग्रेस ने इस घटना को दलित अस्मिता और सामाजिक समानता से जोड़ते हुए कार्रवाई की मांग उठाई। 13 अगस्त को खड़गे ने राज्यसभा में भी यह मुद्दा उठाया, जिसके बाद भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कार्रवाई का आश्वासन दिया।
इसके बाद विवाद राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया। 29 अगस्त को राहुल गांधी ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर घटना को छुआछूत और दलितों के अपमान से जोड़ते हुए भाजपा-आरएसएस की विचारधारा पर सवाल उठाए।
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मामले में एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने की मांग भी की। राहुल गांधी के बयान के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर घटना को जातिगत रंग देने का आरोप लगाया।
भाजपा की ओर से यह भी दावा किया गया कि धार्मिक आयोजन में अनुसूचित जाति समुदाय के लोग भी शामिल थे।
इसके बाद 30 अगस्त को अमित कुमार की शिकायत पर राहुल गांधी के खिलाफ हल्द्वानी में मुकदमा दर्ज किया गया। शिकायत में आरोप लगाया गया कि राहुल गांधी ने 29 अगस्त की प्रेस कॉन्फ्रेंस में अनुसूचित जाति समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाई।
इसके विरोध में 31 अगस्त को कांग्रेस ने पुलिस मुख्यालय, हल्द्वानी कोतवाली समेत प्रदेशभर के थानों और चौकियों में शिकायत देकर मुकदमे का विरोध किया।
2027 के चुनाव से पहले दलित वोट पर नजर
हल्द्वानी का विवाद अब केवल स्थानीय राजनीतिक टकराव तक सीमित नहीं रह गया है। कांग्रेस इसे सामाजिक न्याय और दलित सम्मान के बड़े मुद्दे के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है। इसकी वजह आगामी 2027 विधानसभा चुनाव भी है।
उत्तराखंड में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों का राजनीतिक महत्व काफी बड़ा है। हालांकि दलित मतदाता किसी एक दल के साथ पूरी तरह एकमुश्त नहीं जुड़ा है।
2017 में भाजपा ने 13 में से 11 एससी आरक्षित सीटें जीती थीं, जबकि 2022 में उसका आंकड़ा नौ सीटों पर आ गया और कांग्रेस चार सीटों तक पहुंची।
राष्ट्रीय स्तर पर भी 2024 के लोकसभा चुनाव में एससी आरक्षित सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन 2019 के मुकाबले कमजोर रहा, जबकि कांग्रेस ने सुधार किया।
ऐसे में हल्द्वानी विवाद कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से राजनीतिक अवसर पैदा करता है, लेकिन इसे 2027 में दलित वोटों की गारंटी मानना अभी जल्दबाजी होगी।
आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि कांग्रेस इस विवाद को केवल भाजपा विरोधी आंदोलन तक सीमित रखती है या इसे दलित सम्मान, सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के व्यापक नैरेटिव में बदल पाती है।
यदि कांग्रेस ऐसा करने में सफल रहती है तो मैदानी जिलों की कई विधानसभा सीटों पर इसका राजनीतिक असर दिखाई दे सकता है।
वहीं, यदि भाजपा इस मुद्दे को कांग्रेस की ‘वोट बैंक राजनीति’ के तौर पर स्थापित करने में सफल रहती है, तो हल्द्वानी विवाद कांग्रेस के लिए बड़े चुनावी मुद्दे के बजाय एक सीमित राजनीतिक टकराव तक सिमट सकता है।
फिलहाल हल्द्वानी शुद्धिकरण विवाद उत्तराखंड की 2027 की सियासत में एक अहम शुरुआती परीक्षा बनता दिख रहा है। जहां मुद्दा सिर्फ एक मैदान का नहीं, बल्कि दलित सम्मान और सामाजिक न्याय की राजनीतिक व्याख्या का भी है।


