हाईकोर्ट के अहम फैसले। हाथरस पीड़ित परिवार का होगा पुनर्वास, पिता को मिली बेटी की कस्टडी
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों में महत्वपूर्ण फैसले सुनाते हुए एक ओर उत्तर प्रदेश सरकार को हाथरस गैंगरेप और हत्या पीड़िता के परिवार को तीन महीने के भीतर गाजियाबाद या नोएडा में बसाने का निर्देश दिया है।
वहीं दूसरी ओर एक नाबालिग बच्ची की कस्टडी उसके पिता को सौंपने का आदेश दिया है। अदालत ने दोनों मामलों में राज्य और निचली अदालत की कार्यवाही पर गंभीर टिप्पणियां कीं।
हाथरस पीड़िता के परिवार को तीन महीने में बसाने का निर्देश
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस जसप्रीत सिंह की बेंच ने सोमवार को उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि हाथरस मामले की पीड़िता के परिवार को तीन महीने के भीतर गाजियाबाद या नोएडा में बसाया जाए और वहां उनके रहने व पुनर्वास की समुचित व्यवस्था की जाए।
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार उसके पूर्व के आदेशों के अनुरूप परिवार की गाजियाबाद या गौतम बुद्ध नगर में पुनर्वास की मांग पर विचार करने में “बेवजह रुकावट” डाल रही थी।
अदालत ने राज्य सरकार के 22 फरवरी 2025 के उस निर्णय को भी रद्द कर दिया, जिसमें परिवार को केवल अलीगढ़, एटा या कासगंज में बसाने की पेशकश की गई थी।
बेंच ने कहा कि इस निर्णय में परिवार की गाजियाबाद या गौतम बुद्ध नगर में बसने की मांग पर विचार ही नहीं किया गया। ऐसे में “कानून की नजर में यह कोई फैसला नहीं था।”
अदालत ने उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि आदेश का पालन नहीं होने पर अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होना पड़ सकता है।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि परिवार के पुनर्वास के बाद उसके एक सदस्य को नौकरी दी जाए, जैसा कि 26 जुलाई 2022 के आदेश में कहा गया था। मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर 2026 को होगी।
यह मामला 2020 के हाथरस कांड से जुड़ा है, जिसमें 19 वर्षीय युवती के साथ कथित गैंगरेप के बाद उसकी मौत हो गई थी। 29-30 सितंबर 2020 की रात उसके अंतिम संस्कार को लेकर भी गंभीर विवाद और सवाल उठे थे।
इसके बाद हाईकोर्ट ने सम्मानजनक अंतिम संस्कार के अधिकार से जुड़े मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की थी। बाद की कार्यवाही में पीड़ित परिवार की सुरक्षा, पुनर्वास और अन्य राहतों के मुद्दे भी शामिल हुए।
कोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा कि परिस्थितियां परिवार के इस दावे को बल देती हैं कि सरकार मामले को एक “विरोधी मुकदमे” की तरह देख रही है और परिवार को राहत देने से स्पष्ट रूप से इनकार कर रही है।
पिता को बेटी की कस्टडी से नहीं किया जा सकता वंचित: हाईकोर्ट
दूसरे महत्वपूर्ण फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6 के तहत नाबालिग बेटी का स्वाभाविक अभिभावक होने के नाते पिता को उसकी कस्टडी से तब तक वंचित नहीं किया जा सकता, जब तक उसे अभिभावक बनने के लिए अयोग्य साबित न कर दिया जाए।
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की बेंच ने कहा कि बच्चों की कस्टडी के मामलों में केवल वर्तमान परिस्थितियों को नहीं, बल्कि उनके बेहतर और सुरक्षित भविष्य की संभावनाओं को भी देखना जरूरी है।
मामले में प्रयागराज निवासी एक वकील ने अपनी नाबालिग बेटी की कस्टडी के लिए ससुर और अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। उनकी पत्नी की 2024 में इलाज के दौरान लखनऊ के एसजीपीजीआईएमएस में मौत हो गई थी, जिसके बाद बच्ची ननिहाल पक्ष के पास रह रही थी।
ट्रायल कोर्ट ने पिता की कस्टडी याचिका खारिज कर दी थी और केवल मुलाकात की अनुमति दी थी। इसके खिलाफ पिता ने हाईकोर्ट में अपील की।
दोनों परिवारों की परिस्थितियों का किया गया तुलनात्मक अध्ययन
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियों पर भी विचार किया। अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता और उसके परिवार के कई सदस्य वकील हैं तथा बच्ची के भविष्य के लिए आर्थिक संसाधन उपलब्ध हैं।
दूसरी ओर नाना सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं, उन्हें पेंशन नहीं मिलती और बच्ची की देखभाल में परिवार के अन्य सदस्यों की भी मदद ली जा रही है।
अदालत ने कहा कि नाबालिग बच्ची लगभग चार वर्ष की है और वह इतनी समझदार उम्र में नहीं है कि अपनी कस्टडी के संबंध में कोई परिपक्व निर्णय ले सके।
दहेज प्रताड़ना के आरोपों पर भी अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि दावों और इनकार के अलावा पर्याप्त ठोस सामग्री नहीं थी। मेडिकल रिकॉर्ड में मृतका की बीमारी ट्यूबरकुलर मेनिन्जाइटिस और अन्य गंभीर चिकित्सकीय जटिलताओं से जुड़ी बताई गई।
कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उसमें सभी मुद्दों पर स्पष्ट कारण दर्ज नहीं किए गए थे। यह सीपीसी के ऑर्डर 20 रूल 5 की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं था।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि किसी न्यायिक टिप्पणी को उसके संदर्भ और मामले के तथ्यों से अलग करके कानून के प्रावधान या गणितीय सिद्धांत की तरह लागू नहीं किया जा सकता।
एक महीने में पिता को सौंपी जाएगी कस्टडी
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की डिक्री रद्द करते हुए प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे एक महीने के भीतर नाबालिग बच्ची की कस्टडी उसके पिता को सौंप दें।
हालांकि, बच्ची लंबे समय से ननिहाल पक्ष के साथ रह रही थी, इसलिए अदालत ने मानवीय पहलू को भी ध्यान में रखा। प्रतिवादियों को दोपहर 2 बजे से शाम 5 बजे के बीच डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी, प्रयागराज में बच्ची से मिलने की अनुमति दी गई है। जरूरत पड़ने पर वे ट्रायल कोर्ट से मुलाकात की जगह में बदलाव के लिए आवेदन भी कर सकेंगे।
इन दोनों फैसलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक तरफ हाथरस पीड़िता के परिवार के सम्मानजनक और सुरक्षित पुनर्वास को प्राथमिकता दी है। वहीं दूसरी तरफ नाबालिग के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए पिता के प्राकृतिक अभिभावक होने के अधिकार और बच्चे के भविष्य को अहम माना है।


