चारधाम यात्रा 2026: 15 लाख पार श्रद्धालु। केदारनाथ के लिंचोली क्षेत्र पर हिमस्खलन का बड़ा खतरा

चारधाम यात्रा 2026: 15 लाख पार श्रद्धालु। केदारनाथ के लिंचोली क्षेत्र पर हिमस्खलन का बड़ा खतरा

देहरादून। उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा इस समय अपने चरम पर है। यात्रा शुरू होने के एक महीने के भीतर ही श्रद्धालुओं की संख्या 15 लाख के पार पहुंच गई है।

सबसे अधिक श्रद्धालु केदारनाथ धाम पहुंच रहे हैं, जबकि यह यात्रा सबसे कठिन मानी जाती है। बाबा केदार के जयकारों के बीच हर दिन हजारों श्रद्धालु हिमालय की कठिन चढ़ाई पार कर धाम तक पहुंच रहे हैं।

चारों धामों में श्रद्धालुओं की स्थिति

17 मई तक जारी आंकड़ों के अनुसार यमुनोत्री धाम में 2,62,275 श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। रविवार को अकेले 15,030 श्रद्धालु मां यमुना के दर्शन के लिए पहुंचे।
गंगोत्री धाम में अब तक 2,58,716 श्रद्धालु पहुंच चुके हैं, जबकि 17 मई को 13,737 श्रद्धालुओं ने मां गंगा के दर्शन किए।

केदारनाथ धाम में सबसे अधिक भीड़ देखने को मिल रही है। रविवार को 29,370 श्रद्धालु बाबा केदार के दर्शन के लिए पहुंचे, जिनमें 18,342 पुरुष, 10,938 महिलाएं और 90 बच्चे शामिल रहे। अब तक 6,35,022 श्रद्धालु केदारनाथ धाम पहुंच चुके हैं।

बदरीनाथ धाम में 17 मई को 19,094 श्रद्धालुओं ने भगवान बदरी विशाल के दर्शन किए। अब तक यहां 4,07,659 श्रद्धालु पहुंच चुके हैं। कुल मिलाकर चारों धामों में श्रद्धालुओं की संख्या 15,63,672 तक पहुंच गई है।

केदारनाथ पहुंचे गढ़वाल आईजी, व्यवस्थाओं का लिया जायजा

श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए गढ़वाल परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक राजीव स्वरूप ने रविवार को केदारनाथ धाम पहुंचकर यात्रा व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया। उन्होंने मंदिर परिसर, आस्था पथ, लाइन व्यवस्था और श्रद्धालुओं की एंट्री-एग्जिट व्यवस्था का जायजा लिया।

आईजी ने ड्यूटीरत पुलिस जवानों से बातचीत कर व्यवस्थाओं का फीडबैक लिया और कहा कि बाबा केदार की सेवा करना सौभाग्य की बात है। उन्होंने पुलिसकर्मियों को श्रद्धालुओं के साथ संवेदनशील और सेवा भाव से कार्य करने के निर्देश दिए।

41 पुलिसकर्मी हुए सम्मानित

रुद्रप्रयाग की पुलिस अधीक्षक नीहारिका तोमर ने बताया कि यात्रा अवधि में उत्कृष्ट कार्य करने वाले पुलिसकर्मियों को प्रतिदिन “पुलिस पर्सनल ऑफ दि डे” सम्मान दिया जा रहा है। अब तक 41 पुलिसकर्मियों को सम्मानित किया जा चुका है।

लिंचोली बना चिंता का केंद्र, वैज्ञानिकों ने जताया बड़े हिमस्खलन का खतरा

इधर, केदारनाथ यात्रा मार्ग पर स्थित लिंचोली क्षेत्र को लेकर वैज्ञानिकों ने गंभीर चेतावनी दी है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की स्टडी के अनुसार यह क्षेत्र हिमस्खलन के लिहाज से बेहद संवेदनशील और खतरनाक है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि लिंचोली केवल मौसमी जोखिम वाला क्षेत्र नहीं, बल्कि तीर्थयात्रियों, स्थानीय लोगों और अवसंरचना के लिए बड़ा खतरा बन चुका है।

वरिष्ठ ग्लेशियोलॉजिस्ट डॉ. मनीष मेहता द्वारा किए गए अध्ययन में सामने आया है कि लिंचोली क्षेत्र में हर साल सर्दियों से शुरुआती गर्मियों तक हिमस्खलन सक्रिय रहता है। अप्रैल से जून के बीच तापमान बढ़ने पर बर्फ अस्थिर हो जाती है, जिससे पाउडर स्नो और वेट स्नो एवलांच का खतरा बढ़ जाता है।

2021 की त्रासदी का भी जिक्र

रिपोर्ट में 23 अप्रैल 2021 को गिर्थी गंगा क्षेत्र में आए हिमस्खलन का उल्लेख किया गया है, जिसमें बीआरओ के अस्थायी शिविर पर बर्फ गिरने से 16 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 384 लोगों को सुरक्षित निकाला गया था।

इसके अलावा त्रिशूल पर्वत, हेमकुंड साहिब मार्ग और डोकरीयानी ग्लेशियर क्षेत्र की घटनाओं का भी अध्ययन में जिक्र किया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार 2021 से 2024 के बीच केदारनाथ के उत्तर दिशा में कई बार हिमस्खलन की घटनाएं दर्ज की गई हैं।

हर मिनट गुजरते हैं 100 से 200 यात्री

अध्ययन के मुताबिक हिमस्खलन लगभग 4160 मीटर की ऊंचाई से शुरू होकर 3250 मीटर तक नीचे आता है और करीब 1.5 किलोमीटर क्षेत्र को प्रभावित करता है।

चारधाम यात्रा के दौरान मई और जून में सबसे अधिक भीड़ रहती है। इसी समय रामबाड़ा से केदारनाथ मंदिर तक करीब 6 किलोमीटर लंबे हिस्से में हर मिनट 100 से 200 श्रद्धालु गुजरते हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि किसी भी समय बड़ा हिमस्खलन भारी जनहानि का कारण बन सकता है।

वैज्ञानिकों ने दिए अहम सुझाव

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि प्रस्तावित रोपवे परियोजना के टावर हिमस्खलन क्षेत्र से कम से कम 200 से 300 मीटर दूर बनाए जाएं। साथ ही केदारनाथ के लिए वैकल्पिक पैदल मार्ग विकसित करने, पुराने पैदल मार्ग को पुनः खोलने और मध्य व निचले हिस्सों में चेक डैम तथा डायवर्जन संरचनाएं विकसित करने की सिफारिश की गई है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि धार्मिक आस्था के साथ अब वैज्ञानिक जोखिम प्रबंधन को भी प्राथमिकता देनी होगी। बढ़ती यात्रा, निर्माण गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के कारण केदारघाटी का पूरा क्षेत्र अधिक संवेदनशील होता जा रहा है। यदि समय रहते रणनीतिक हस्तक्षेप नहीं किया गया तो भविष्य में बड़ी त्रासदी से इनकार नहीं किया जा सकता।