सुरक्षा का बहाना या सच से परहेज? RTI में हथियारों की जानकारी देने से पीछे हटी पुलिस
- एक्टिविस्ट हेमंत गौनिया के सवालों पर चुप्पी, पारदर्शिता बनाम सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल
हल्द्वानी। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी को लेकर उधम सिंह नगर पुलिस एक बार फिर विवादों में घिरती नजर आ रही है।
RTI एक्टिविस्ट Hemant Gauniya द्वारा जिले के थानों और चौकियों में मौजूद हथियारों, गोलियों और उनसे जुड़े खर्च का विस्तृत ब्योरा मांगा गया था, लेकिन पुलिस विभाग ने “सुरक्षा का खतरा” बताकर लगभग पूरी जानकारी देने से इनकार कर दिया।
दरअसल, RTI आवेदन में वर्ष 2005 से 2025 तक का विस्तृत रिकॉर्ड मांगा गया था। इसमें थानों में उपलब्ध हथियारों की संख्या, इस्तेमाल की गई गोलियां और कारतूस, सर्विसिंग और मरम्मत पर हुए खर्च, हथियारों की खरीद प्रक्रिया, टेंडर से जुड़े दस्तावेज, लाइसेंस-रजिस्ट्रेशन का ब्यौरा और डीकमीशन हथियारों की जानकारी शामिल थी। यानी यह पूरी तरह प्रशासनिक और वित्तीय पारदर्शिता से जुड़ा मामला था।
आवेदन पुलिस अधीक्षक कार्यालय में दिया गया, जहां से इसे संबंधित थानों और अधिकारियों को भेजा गया। हालांकि, सभी स्तरों पर एक जैसा जवाब मिला। सूचना देने से “सुरक्षा को खतरा” हो सकता है। हैरानी की बात यह है कि कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया गया कि मांगी गई जानकारी से किस प्रकार का वास्तविक खतरा उत्पन्न हो सकता है।
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धाराओं के अनुसार, हर नागरिक को सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है।
केवल वही जानकारी रोकी जा सकती है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को ठोस खतरा हो। साथ ही, यदि किसी सूचना का एक हिस्सा संवेदनशील हो, तो शेष जानकारी देना अनिवार्य होता है।
लेकिन इस मामले में पूरी सूचना को ही रोक दिया गया, जिससे कानून की मंशा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
RTI एक्टिविस्ट Hemant Gauniya का कहना है कि पुलिस विभाग “सुरक्षा” का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहा है।
उनके अनुसार, जिन बिंदुओं पर जानकारी रोकी गई है, वे सरकारी खर्च और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़े हैं, जहां पारदर्शिता बेहद जरूरी होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में “सुरक्षा” का व्यापक और अस्पष्ट तर्क देना अक्सर जवाबदेही से बचने का माध्यम बन जाता है। खासकर तब, जब बात हथियारों की खरीद, रखरखाव और उपयोग जैसे संवेदनशील लेकिन सार्वजनिक धन से जुड़े मामलों की हो।
यह मामला अब एक बड़े सवाल के रूप में उभर रहा है। क्या वास्तव में यह जानकारी देने से सुरक्षा को खतरा था, या फिर किसी संभावित अनियमितता को छुपाने के लिए कानून का सहारा लिया गया?
उधम सिंह नगर पुलिस का यह रवैया न केवल सूचना के अधिकार अधिनियम की भावना पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि सरकारी तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करता है।
अब नजर इस बात पर है कि क्या इस मामले में उच्च स्तर पर कोई जांच होती है या फिर “सुरक्षा” की आड़ में यह मुद्दा भी ठंडे बस्ते में चला जाएगा।



