हरिद्वार कोषागार घोटाले में 20 साल बाद 8 दोषी करार, सिस्टम को मिला सख्त संदेश
हरिद्वार कोषागार से फर्जी बिलों के जरिए करीब 55.10 लाख रुपये की अवैध निकासी के बहुचर्चित मामले में करीब दो दशक बाद न्याय मिला है।
Central Bureau of Investigation (CBI) की विशेष अदालत ने इस मामले में तत्कालीन सहायक कोषाधिकारी पालू दास समेत 8 आरोपियों को दोषी करार दिया है, जबकि एक आरोपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया।
विशेष न्यायाधीश मदन राम की अदालत ने यह फैसला सुनाते हुए वर्ष 2001-02 के इस पुराने घोटाले को फिर चर्चा में ला दिया है।
यह पूरा मामला वर्ष 2001-02 का है, जब हरिद्वार और रुड़की के लोक निर्माण विभाग (PWD), कोषागार अधिकारियों और कुछ निजी व्यक्तियों ने मिलकर सरकारी धन की हेराफेरी की साजिश रची।
जांच में सामने आया कि वेतन एरियर के नाम पर फर्जी बिल बनाए गए, जीपीएफ एडवांस के कूटरचित दस्तावेज तैयार किए गए, मेडिकल बिलों में हेराफेरी की गई और स्टेशनरी खर्च के नाम पर फर्जी क्लेम पेश किए गए। इन तरीकों से सरकारी चेक जारी कराकर करीब 55.10 लाख रुपये की अवैध निकासी कर ली गई।
मामले की जांच 2002 में रानीपुर थाने में मुकदमा दर्ज होने के साथ शुरू हुई और 2003 में हाईकोर्ट के आदेश के बाद इसे CBI को सौंप दिया गया। 9 अगस्त 2003 को CBI ने एफआईआर दर्ज की और 2005 में 20 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।
2009 में अदालत ने आरोप तय किए। सुनवाई के दौरान 4 आरोपियों की मृत्यु हो गई, जबकि 7 ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। अभियोजन पक्ष की ओर से 56 और बचाव पक्ष की ओर से 3 गवाह पेश किए गए।
अदालत ने दीपक कुमार वर्मा, सुखपाल सिंह, मदन पाल, मणि राम, सुरेंद्र कुमार उर्फ शर्मा जी, चतर सिंह, कासिम और पालू दास को दोषी ठहराते हुए विभिन्न धाराओं में सजा सुनाई है।
इनमें आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक विश्वासघात और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप शामिल हैं। दोषियों को अलग-अलग धाराओं में एक-एक वर्ष का कठोर कारावास और जुर्माना तथा भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत दो वर्ष का अतिरिक्त कारावास दिया गया है।
तत्कालीन सहायक कोषाधिकारी पालू दास पर अदालत ने सबसे सख्त रुख अपनाया और उन्हें धारा 409 सहित गंभीर आरोपों में दोषी पाया।
जांच में यह भी सामने आया कि घोटाले की राशि में से लगभग 31.99 लाख रुपये बाद में जमा करा दिए गए, लेकिन करीब 8.13 लाख रुपये अब भी बरामद नहीं हो सके हैं। वहीं एक निजी व्यक्ति को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया।
इस पूरे मामले में CBI की ओर से लोक अभियोजक अभिषेक अरोड़ा की मजबूत पैरवी अहम साबित हुई। करीब 20 साल बाद आए इस फैसले ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में भले ही देरी हो, लेकिन न्याय की प्रक्रिया अंततः अपना काम करती है और दोषियों को सजा मिलती है।



