सिर्फ़ WhatsApp चैट के आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता: हाईकोर्ट
मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल WhatsApp चैट के आधार पर किसी दंपत्ति को तलाक नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 13(1)(i-a) के तहत क्रूरता के आरोपों को कानूनी रूप से स्वीकार्य और प्रमाणित साक्ष्यों से साबित करना आवश्यक है।
यह टिप्पणी जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजुषा देशपांडे की डिवीजन बेंच ने उस अपील की सुनवाई के दौरान की, जिसमें पत्नी ने फैमिली कोर्ट द्वारा 27 मई 2025 को दिए गए एकतरफा तलाक के फैसले को चुनौती दी थी।
फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका स्वीकार करते हुए यह माना था कि पत्नी ने मानसिक क्रूरता की है। अदालत ने अपने फैसले में पति-पत्नी के बीच हुए WhatsApp चैट और SMS संदेशों को आधार बनाया था।
इन चैट में पत्नी द्वारा पति पर नासिक में अपने माता-पिता के साथ रहने के बजाय पुणे शिफ्ट होने का दबाव बनाने और कुछ संदेशों में कथित तौर पर पति के परिवार के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने का उल्लेख किया गया था।
हालांकि हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के इस तर्क को सही नहीं माना। अदालत ने कहा कि जिन इलेक्ट्रॉनिक संदेशों को सबूत के तौर पर प्रस्तुत किया गया, उन्हें कानूनी तरीके से प्रमाणित नहीं किया गया था और पत्नी को उन सबूतों को चुनौती देने या उनका खंडन करने का अवसर भी नहीं दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि केवल WhatsApp चैट पर भरोसा करके तलाक का आदेश देना न्यायसंगत नहीं है, क्योंकि ऐसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को विधिवत साबित करना जरूरी होता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि पति की गवाही को केवल चैट और संदेशों से समर्थित बताया गया, जबकि पत्नी को उन साक्ष्यों को गलत साबित करने का अवसर नहीं दिया गया। ऐसे में केवल इन संदेशों के आधार पर तलाक का आदेश देना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा 27 मई 2025 को दिया गया तलाक का फैसला रद्द कर दिया और मामले को दोबारा सुनवाई के लिए फैमिली कोर्ट को वापस भेज दिया।
अदालत ने निर्देश दिया कि दोनों पक्षों को अपने-अपने साक्ष्य पेश करने का पूरा अवसर दिया जाए और उसके बाद ही मामले पर नया निर्णय लिया जाए।



