DNA टेस्ट की मांग खारिज, देहरादून में प्रतिबंधित क्षेत्रों में निर्माण पर भी उठे सवाल
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों में महत्वपूर्ण रुख अपनाते हुए एक ओर नाबालिग के डीएनए परीक्षण की मांग को खारिज कर दिया, तो वहीं दूसरी ओर देहरादून के प्रतिबंधित क्षेत्रों में हो रहे निर्माण कार्यों को लेकर दायर जनहित याचिका पर सख्ती दिखाई है।
पहले मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि वैध विवाह से जन्मे बच्चे की गरिमा, वैधता और निजता की रक्षा सर्वोपरि है। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने एक पिता द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए कहा कि डीएनए परीक्षण जैसे आदेश सामान्य परिस्थितियों में नहीं दिए जा सकते।
मामला नैनीताल निवासी एक व्यक्ति से जुड़ा था, जिसने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत पत्नी पर व्यभिचार के आरोप लगाते हुए बच्चे का डीएनए परीक्षण कराने की मांग की थी।
अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 का हवाला देते हुए कहा कि वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को स्वतः वैध माना जाता है और इस धारणा को केवल ठोस व विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है।
कोर्ट ने यह भी दोहराया कि बिना पर्याप्त आधार के डीएनए जांच की अनुमति देना बच्चे के अधिकारों और निजता का उल्लंघन होगा, इसलिए पारिवारिक न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा गया।
वहीं दूसरे मामले में देहरादून की समाजसेवी रेनू पॉल द्वारा दायर जनहित याचिका में देहरादून घाटी के प्रतिबंधित क्षेत्रों में हो रहे अवैध निर्माण का मुद्दा उठाया गया है।
याचिका में बताया गया कि वर्ष 2011 में लागू बिल्डिंग बायलॉज और 2015 के संशोधन के अनुसार 30 डिग्री से अधिक ढलान व भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में निर्माण पर रोक है। साथ ही 2019 के शासनादेश में फुटहिल क्षेत्रों को चिन्हित कर वहां निर्माण गतिविधियों को प्रतिबंधित किया गया था।
इसके बावजूद देहरादून की तलहटी में बहुमंजिला इमारतों का निर्माण जारी है, जो नियमों की अनदेखी और संभावित खतरे की ओर इशारा करता है।
याचिका में अदालत से ऐसे निर्माण कार्यों पर रोक लगाने और जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की गई है। हाईकोर्ट में इस मामले पर सुनवाई जारी है और आने वाले समय में इस पर बड़ा फैसला आ सकता है।

