सुप्रीम कोर्ट का सख़्त संदेश। प्रोबेशन की राहत, दोष का दाग नहीं धोती
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी कर्मचारी को आपराधिक मामले में प्रोबेशन (परिवीक्षा) का लाभ मिल जाना, विभागीय कार्यवाही में दी गई सजा को कम करने का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने दो टूक कहा कि प्रोबेशन पर रिहाई से दोषसिद्धि (कन्विक्शन) का कलंक समाप्त नहीं होता।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को गलत ठहराया, जिसमें कर्मचारी की सजा केवल इस आधार पर कम कर दी गई थी कि उसे आपराधिक मामले में प्रोबेशन का लाभ मिला है।
पीठ ने टिप्पणी की कि, “हाईकोर्ट यह मानकर गलती कर बैठा कि दोषसिद्धि कोई अयोग्यता नहीं है और केवल इसी आधार पर कर्मचारी को सेवा से हटाया नहीं जा सकता।”
क्या है पूरा मामला
यह मामला एक ऐसे कर्मचारी से जुड़ा था, जिसने अपने भाई का रूप धारण कर और जाली शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी हासिल की थी। विभागीय जांच में आरोप सिद्ध होने के बाद उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
इसके बाद लेबर कोर्ट ने बर्खास्तगी की सजा को संशोधित करते हुए वेतन में कटौती और तीन वर्षों तक वेतन वृद्धि रोकने का आदेश दिया।
वहीं मद्रास हाईकोर्ट ने यह कहते हुए सजा को अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) में बदल दिया कि कर्मचारी को आपराधिक मामले में प्रोबेशन का लाभ मिला था।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख
हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए अधीक्षण अभियंता (Superintending Engineer) सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। अपील में यूनियन ऑफ इंडिया बनाम बख्शी राम (1990) के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें साफ कहा गया है कि प्रोबेशन पर रिहाई से दोषसिद्धि का कलंक समाप्त नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि,
जब तक दोषसिद्धि कायम है, तब तक केवल प्रोबेशन का लाभ मिलने के आधार पर बर्खास्तगी जैसी सजा को कम नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट की टिप्पणी कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है।
मानवीय आधार पर राहत
हालांकि कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि संबंधित कर्मचारी की मृत्यु हो चुकी है, इसलिए हाईकोर्ट द्वारा सजा में किए गए संशोधन में हस्तक्षेप नहीं किया गया। इसी आधार पर अपील का निपटारा कर दिया गया।



