बारिश, भूस्खलन और बदहाल सड़कें बनीं मुसीबत, सीमा पर तैयार हुआ भारत-नेपाल का अहम पुल
देहरादून। उत्तराखंड में एक ओर भारत-नेपाल के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण परियोजनाएं चर्चा में हैं, तो दूसरी ओर भूस्खलन, बदहाल सड़कें और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।
राज्य के अलग-अलग हिस्सों से सामने आई घटनाएं विकास और जमीनी चुनौतियों की दो अलग-अलग तस्वीरें पेश कर रही हैं।
पिथौरागढ़ जिले के धारचूला में भारत-नेपाल को जोड़ने वाले 110 मीटर लंबे मोटरेबल पुल को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। महाकाली नदी पर करीब 32.98 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस पुल का निर्माण दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी और व्यापार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया है।
हालांकि पुल पर लगाए गए एक बोर्ड को लेकर आपत्ति सामने आने के बाद भारतीय पक्ष ने उसे काली पन्नी से ढक दिया है। लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि संबंधित बोर्ड को हटाकर नया बोर्ड लगाया जाएगा।
पुल के शुरू होने से अब तक नेपाल जाने के लिए लोगों को बनबसा होकर करीब 200 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करने की मजबूरी से राहत मिलने की उम्मीद है।
उधर रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ यात्रा एक बार फिर प्राकृतिक आपदा की मार से प्रभावित हुई। चीरबासा हेलीपैड के समीप पहाड़ी से अचानक भारी मात्रा में मलबा और बोल्डर गिरने से पैदल मार्ग अवरुद्ध हो गया।
प्रशासन ने यात्रियों की सुरक्षा को देखते हुए गौरीकुंड से केदारनाथ धाम की ओर पैदल आवाजाही तत्काल रोक दी। जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) की टीमें मौके पर मलबा हटाने में जुटी हैं और मार्ग सुरक्षित होने के बाद ही यात्रा दोबारा शुरू करने का निर्णय लिया जाएगा।
हरिद्वार में भी सड़कों की बदहाल स्थिति लोगों की परेशानी का कारण बनी हुई है। मनसा देवी मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं और स्थानीय व्यापारियों ने टूटी सड़कों, गड्ढों और अव्यवस्थित व्यवस्थाओं को लेकर नाराजगी जताई है।
मामले पर जिलाधिकारी मयूर दीक्षित ने कहा कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर 15 सितंबर से जिले में गड्ढा मुक्त अभियान चलाया जाएगा और 15 अक्टूबर तक सभी सड़कों को दुरुस्त करने का लक्ष्य रखा गया है। सड़क धंसने की घटनाओं पर भी प्रशासन ने सख्त रुख अपनाने की बात कही है।
राजधानी देहरादून में कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के सरकारी आवास के बाहर ड्रेनेज अतिक्रमण और सीवर के पानी के कारण दीवार को खतरा पैदा होने का मामला चर्चा का विषय बना रहा। मंत्री आवास के बाहर पूरी प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय दिखाई दी।
एडीएम, एसडीएम, तहसीलदार समेत कई विभागों के अधिकारी मौके पर पहुंचे और ड्रेनेज सिस्टम की जांच में जुट गए। इस घटना के बाद आम और खास के लिए प्रशासनिक संवेदनशीलता को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
टिहरी जिले के नरेंद्रनगर क्षेत्र में पिपलेथ समेत पांच गांवों को जोड़ने वाला मोटरमार्ग पिछले कई वर्षों से बदहाल स्थिति में है। सड़क पर दरारें, लगातार भूस्खलन और एक बड़े हिस्से के टूट जाने से ग्रामीणों को जान जोखिम में डालकर सफर करना पड़ रहा है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि करीब पांच वर्षों से सड़क निर्माण अधूरा पड़ा है और कई बार शिकायतों के बावजूद स्थायी समाधान नहीं निकला। ग्रामीणों की समस्या सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं है, बल्कि मोबाइल नेटवर्क की कमी भी आपातकालीन परिस्थितियों में बड़ी चुनौती बन रही है।
इस बीच भूस्खलन को लेकर वैज्ञानिकों की एक अध्ययन रिपोर्ट भी सामने आई है, जिसमें उत्तराखंड के संवेदनशील इलाकों की पहचान कर प्रशासन को विशेष निगरानी, ढलान स्थिरीकरण, निर्माण नियंत्रण और वनीकरण जैसे उपायों को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि संवेदनशीलता मानचित्र (Susceptibility Map) आपदा प्रबंधन और विकास योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण निर्णय-सहायक उपकरण साबित हो सकता है।
वहीं पिथौरागढ़ जिले में लगातार बारिश और भूस्खलन ने एक बार फिर मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हाल ही में तैयार किया गया बैली ब्रिज बह जाने के बाद धारचूला-तवाघाट-गुंजी मार्ग को सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया है।
जिला प्रशासन ने लोगों से अनावश्यक यात्रा से बचने और मौसम को देखते हुए सावधानी बरतने की अपील की है। जिले में एक दर्जन से अधिक सड़कें बंद होने के कारण जनजीवन प्रभावित हो रहा है।
कुल मिलाकर उत्तराखंड में एक ओर सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास परियोजनाएं गति पकड़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर भूस्खलन, क्षतिग्रस्त सड़कें, कमजोर आधारभूत ढांचा और प्रशासनिक चुनौतियां राज्य के सामने बड़ी परीक्षा बनकर खड़ी हैं।


