किसानों के नाम पर ड्रोन डील! उत्तराखंड कृषि विभाग में डेढ़ करोड़ के कथित फर्जीवाड़े की जांच
- 250 ड्रोन खरीद के कथित एमओयू पर उठे सवाल, क्लर्क निलंबित, पूर्व निदेशक की भूमिका भी जांच के घेरे में
देहरादून। उत्तराखंड कृषि विभाग में किसानों के लिए ड्रोन खरीद से जुड़ा एक कथित फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है।
आरोप है कि महाराष्ट्र की एक निजी कंपनी से करीब डेढ़ करोड़ रुपये की कथित वसूली कर 250 कृषि ड्रोन खरीदने का भरोसा दिया गया, लेकिन न तो ड्रोन खरीदे गए और न ही योजना धरातल पर उतर सकी।
मामले की शिकायत कृषि मंत्री तक पहुंचने के बाद अब शासन स्तर पर जांच शुरू कर दी गई है।
शिकायत महाराष्ट्र की निजी कंपनी के प्रतिनिधि शेषाद्रि विश्वनाथन की ओर से शपथपत्र के माध्यम से की गई है।
आरोप है कि करीब एक वर्ष पहले कृषि विभाग के अधिकारियों ने किसानों के लिए ड्रोन खरीदने का प्रस्ताव देते हुए कंपनी के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) किया और इसके बदले करीब 1.5 करोड़ रुपये की धनराशि ली गई। हालांकि बाद में न तो ड्रोन की खरीद हुई और न ही कंपनी को कोई कार्य मिला।
आरोपों के अनुसार उस समय कृषि विभाग के निदेशक के रूप में केसी पाठक कार्यरत थे। कहा जा रहा है कि विभाग की ओर से लगभग 250 ड्रोन खरीदने पर सहमति बनी थी, लेकिन पूरी प्रक्रिया पर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जांच का प्रमुख विषय यह भी है कि यदि एमओयू हुआ था तो क्या उसे विधिवत विभागीय और वित्तीय स्वीकृतियां प्राप्त थीं।
प्राथमिक जांच के बाद कृषि निदेशालय के कनिष्ठ सहायक सुमित सिंह को निलंबित कर दिया गया है। हालांकि विभागीय हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि डेढ़ करोड़ रुपये के कथित लेन-देन जैसे गंभीर मामले की जिम्मेदारी केवल एक कर्मचारी पर कैसे तय की जा सकती है। यदि आरोप सही हैं तो क्या वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की भी जांच नहीं होनी चाहिए।
मामले को लेकर विपक्ष ने भी सरकार पर निशाना साधा है। कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता अमेंद्र बिष्ट ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार में भ्रष्टाचार के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है और कृषि विभाग का यह कथित ड्रोन घोटाला भी उसी का उदाहरण है। उन्होंने निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
उधर, कृषि मंत्री गणेश जोशी ने मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया जिस कर्मचारी को निलंबित किया गया है, उसके खिलाफ कार्रवाई की गई है। साथ ही पूर्व निदेशक की संलिप्तता के आरोपों की भी शासन स्तर पर जांच कराई जाएगी।
मंत्री के अनुसार शिकायतकर्ता का कहना है कि ड्रोन का काम दिलाने के नाम पर धन लिया गया और फर्जी एग्रीमेंट दिया गया। पूरे मामले की सच्चाई जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
बताया जा रहा है कि यह मामला करीब एक वर्ष पुराना है, लेकिन विभागीय जांच अब शुरू हुई है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहे हैं कि यदि शिकायत पहले सामने आती तो क्या कार्रवाई पहले हो सकती थी। फिलहाल पूर्व निदेशक केसी पाठक का पक्ष सामने नहीं आया है। उनसे संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन बातचीत नहीं हो सकी।
अब सबकी नजर शासन की जांच पर टिकी है। जांच से ही यह स्पष्ट होगा कि कथित फर्जीवाड़ा केवल कुछ कर्मचारियों तक सीमित था या इसके पीछे कोई बड़ा तंत्र काम कर रहा था। साथ ही यह भी सामने आएगा कि किसानों के लिए प्रस्तावित ड्रोन योजना आखिर कागजों से आगे क्यों नहीं बढ़ सकी।


