गजब खुलासा: UPCL में RTI की खुली धज्जियां! सुनवाई पहले, सूचना बाद में पहुंची

UPCL में RTI की खुली धज्जियां! सुनवाई पहले, सूचना बाद में पहुंची

देहरादून। उत्तराखण्ड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPCL) में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

समाजसेवी Hemant Singh Gauniya द्वारा दायर प्रथम विभागीय अपील की सुनवाई 19 मई 2026 को तय की गई थी, लेकिन सुनवाई का आधिकारिक पत्र शिकायतकर्ता को 22 मई को प्राप्त हुआ। इस पूरे घटनाक्रम ने विभागीय पारदर्शिता और प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला यूपीसीएल पंतनगर क्षेत्र से जुड़ा है, जहां भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे पूर्व एवं रिटायर्ड कर्मचारियों को दोबारा महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किए जाने की शिकायतें सामने आई थीं।

इस संबंध में समाजसेवी हेमंत सिंह गौनिया ने यूपीसीएल प्रबंधन और संबंधित विभागों को शिकायत भेजी थी तथा सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी मांगी थी।

प्राप्त पत्र के अनुसार अधीक्षण अभियंता एवं विभागीय अपीलीय अधिकारी Pradeep Kumar Pant द्वारा अपील संख्या-220 पर सुनवाई की तिथि 19 मई 2026 सुबह 11:30 बजे निर्धारित की गई थी।

पत्र में यह भी उल्लेख था कि अपीलकर्ता स्वयं अथवा प्रतिनिधि के माध्यम से उपस्थित होकर अपना पक्ष रख सकता है।

हालांकि शिकायतकर्ता का आरोप है कि नियमानुसार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग अथवा विधिवत प्रक्रिया अपनाने के बजाय विभागीय अधिकारियों ने सीधे फोन कॉल कर मामले को निपटाने का प्रयास किया।

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब सुनवाई 19 मई को निर्धारित थी, तो 15 मई को जारी पत्र शिकायतकर्ता तक 22 मई को क्यों पहुंचा?

शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह सूचना अधिकार अधिनियम की मूल भावना के विपरीत है और अपीलकर्ता को समय पर सूचना से वंचित किया गया।

पत्र पर अधीक्षण अभियंता एवं विभागीय अपीलीय अधिकारी प्रदीप कुमार पंत के हस्ताक्षर मौजूद हैं। इसकी प्रतिलिपि लोक सूचना अधिकारी, यूपीसीएल, विक्टोरिया क्रॉस विजेता गबर सिंह ऊर्जा भवन, देहरादून को भी भेजी गई है।

समाजसेवी हेमंत सिंह गौनिया का आरोप है कि यूपीसीएल में रिटायर्ड एवं विवादित कर्मचारियों की पुनर्नियुक्ति कर नियमों की अनदेखी की जा रही है। वहीं, जब इस संबंध में आरटीआई के जरिए जानकारी मांगी गई तो विभाग सूचना उपलब्ध कराने के बजाय पूरी प्रक्रिया को संदिग्ध बना रहा है।

सूचना अधिकार अधिनियम के जानकारों का कहना है कि यदि सुनवाई की सूचना समय पर नहीं दी गई और अपीलकर्ता को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं मिला, तो इसे अधिनियम की भावना के विपरीत माना जा सकता है।

अब यह मामला केवल आरटीआई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यूपीसीएल की प्रशासनिक कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और विभागीय जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।