नैनीताल झील प्रदूषण मामले में NGT सख्त, सीवर और लाल होते पानी पर कई विभागों से जवाब तलब
नैनीताल। विश्वप्रसिद्ध Nainital Lake में बढ़ते प्रदूषण, सीवर की गंदगी और पानी के रंग में बदलाव को लेकर दायर मामले में National Green Tribunal ने गंभीर रुख अपनाया है।
समाजसेवी Hemant Singh Gonia की शिकायत पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने उत्तराखंड सरकार समेत कई विभागों और वरिष्ठ अधिकारियों से विस्तृत जवाब मांगा है। मामले में उत्तराखंड के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PPCF/HoFF) को भी प्रतिवादी बनाया गया है।
मामला ओरिजिनल एप्लीकेशन संख्या 1335/2024 से जुड़ा है, जिस पर 29 अप्रैल 2026 को सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति Arun Kumar Tyagi और विशेषज्ञ सदस्य Dr. A. Senthil Vel की पीठ ने राज्य सरकार और संबंधित विभागों द्वारा दाखिल अतिरिक्त हलफनामों पर असंतोष जताया।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि झील संरक्षण, सीवर नियंत्रण और प्रदूषण रोकने से संबंधित योजनाओं की पूरी और आवश्यक जानकारी रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं की गई है।
एनजीटी ने स्पष्ट किया कि झील में गिर रहे सीवर, गंदे पानी और पर्यावरणीय क्षति को रोकने के लिए बनाई गई योजनाओं की तकनीकी रिपोर्ट, कार्य प्रगति और सुधारात्मक कदमों का स्पष्ट ब्यौरा आवश्यक है।
राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता Adarsh Chamoli ने अतिरिक्त जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा, जिसके बाद ट्रिब्यूनल ने दो महीने का समय देते हुए अगली सुनवाई 14 जुलाई 2026 तय कर दी।
कई बड़े विभागों से मांगा गया जवाब
मामले में जिन विभागों और अधिकारियों को जवाब देना है, उनमें पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग उत्तराखंड, नैनीताल जिला प्रशासन, कुमाऊं आयुक्त कार्यालय, राज्य वेटलैंड प्राधिकरण, उत्तराखंड वन विभाग, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जल संस्थान प्रमुख रूप से शामिल हैं।
ट्रिब्यूनल ने मामले की गंभीरता को देखते हुए PPCF (HoFF) उत्तराखंड को भी प्रतिवादी संख्या-6 के रूप में शामिल किया है। एनजीटी का मानना है कि झील से जुड़े गंभीर पर्यावरणीय प्रश्नों के समाधान के लिए शीर्ष वन अधिकारी की भूमिका आवश्यक है।
“नैनीताल झील वेटलैंड नहीं” वाले जवाब पर विवाद
मामले में उस समय नया विवाद खड़ा हो गया जब राज्य वेटलैंड प्राधिकरण ने अपने जवाब में कहा कि Nainital Lake वेटलैंड की श्रेणी में नहीं आती, क्योंकि Wetlands Rules 2017 उन क्षेत्रों पर लागू नहीं होते जो भारतीय वन अधिनियम 1927 और वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अंतर्गत आते हैं।
इस जवाब के बाद पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए कि यदि झील संरक्षण नियम लागू नहीं होंगे, तो झील संरक्षण की जवाबदेही किस विभाग की होगी।
सीवर और लाल होते पानी पर चिंता
याचिकाकर्ता Hemant Singh Gonia ने आरोप लगाया है कि झील में लगातार सीवर और गंदा पानी गिर रहा है, जिससे पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। कई स्थानों पर पानी के लाल होने और प्रदूषण बढ़ने की शिकायतें भी सामने आई हैं। याचिका में झील के अस्तित्व पर खतरे और पर्यावरणीय क्षति को भी प्रमुख मुद्दा बनाया गया है।
अब 14 जुलाई 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं, जहां संबंधित विभागों को यह बताना होगा कि झील संरक्षण और प्रदूषण रोकने के लिए अब तक जमीन पर क्या कार्रवाई की गई है और भविष्य के लिए क्या ठोस योजना तैयार की गई है।

