विशेष रिपोर्ट: पहाड़ों पर मानसून का डबल अटैक! सड़कें धंसीं, पुल टूटे और मकानों में दरारें। 940 गांवों पर मंडरा रहा खतरा

पहाड़ों पर मानसून का डबल अटैक! सड़कें धंसीं, पुल टूटे और मकानों में दरारें। 940 गांवों पर मंडरा रहा खतरा

देहरादून। उत्तराखंड में मानसून लगातार सक्रिय बना हुआ है। पहाड़ों से लेकर मैदानी इलाकों तक रुक-रुककर हो रही बारिश ने जनजीवन प्रभावित कर दिया है।

भारी बारिश के कारण जगह-जगह भूस्खलन, भू-धंसाव, बोल्डर और मलबा गिरने से सड़कें बाधित हो रही हैं। कई स्थानों पर पुल और सुरक्षा दीवारों को भी नुकसान पहुंचा है। मौसम विभाग ने कई जिलों में बारिश, गरज-चमक और आकाशीय बिजली को लेकर अलर्ट जारी किया है।

मौसम विभाग के अनुसार, उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों के साथ ऊधमसिंह नगर में गरज-चमक के साथ बारिश की संभावना है। हरिद्वार में कुछ स्थानों पर हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है।

वहीं देहरादून, टिहरी, नैनीताल, पिथौरागढ़, बागेश्वर और चंपावत में कहीं-कहीं भारी बारिश का अनुमान है। पर्वतीय क्षेत्रों में आकाशीय बिजली के साथ बारिश को लेकर भी लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।

1944 सड़कें प्रभावित, 102 अभी भी बंद

मानसून सीजन में सड़कें सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं। लोक निर्माण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 21 जून से 12 अगस्त 2026 तक प्रदेश में कुल **1944 सड़कें प्रभावित** हुईं।

इनमें से 1821 सड़कों को यातायात के लिए खोल दिया गया है, जबकि **102 सड़कें अभी भी बाधित** हैं। इस दौरान सड़कें खोलने के लिए करीब **19 करोड़ रुपये** खर्च किए जा चुके हैं।

सड़कों को पूरी तरह पूर्व स्थिति में लाने के लिए करीब **211.10 करोड़ रुपये** की जरूरत का अनुमान लगाया गया है। प्रभावित मार्गों में स्टेट हाईवे, राष्ट्रीय राजमार्ग, मुख्य जिला मार्ग, ग्रामीण और अन्य संपर्क मार्ग शामिल हैं।

सबसे ज्यादा सड़कें पौड़ी जिले में प्रभावित हुई हैं। यहां **375 सड़कें** बाधित हुईं। इसके बाद टिहरी में 261, चमोली में 186, पिथौरागढ़ में 182, अल्मोड़ा में 181, देहरादून में 173 और उत्तरकाशी में 164 सड़कें प्रभावित हुई हैं।

लोक निर्माण विभाग के सचिव डॉ. पंकज कुमार पांडेय के मुताबिक विभाग का प्रयास है कि कोई भी सड़क 24 घंटे से ज्यादा समय तक बंद न रहे। संवेदनशील और महत्वपूर्ण मार्गों पर मशीनरी तैनात की गई है।

उत्तरकाशी में भू-धंसाव से बढ़ी दहशत

उत्तरकाशी के नौगांव नगर पंचायत के सौली कस्बे में भू-धंसाव की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। बारिश के बाद स्योरी मोटर मार्ग पर पहले से मौजूद दरारें और गहरी हो गई हैं। तीन और मकानों में दरारें आने से स्थानीय लोगों में भय का माहौल है।

भू-धंसाव के कारण पहले ही कई मकान खतरे की जद में आ चुके हैं। कुछ परिवारों ने अपने घर खाली कर दिए हैं। प्रशासन और भूवैज्ञानिकों की टीम ने क्षेत्र का निरीक्षण किया है।

जांच में करीब तीन से चार मीटर मोटी मिट्टी की परत पाई गई। प्रथम दृष्टया बारिश के पानी के जमीन में रिसाव को भू-धंसाव का एक कारण माना जा रहा है।

ढलान की दिशा में झुके चीड़ के पेड़ों को देखते हुए क्षेत्र में लगातार भू-भाग के खिसकने की आशंका भी जताई गई है। प्रशासन ने अति संवेदनशील क्षेत्र में आने वाले परिवारों के संभावित विस्थापन का फैसला जांच रिपोर्ट के आधार पर लेने की बात कही है।

गंगोत्री हाईवे पर सुरक्षा दीवार धंसी

उत्तरकाशी में गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर सोनगाड़ और लिम्चागाड़ में सुरक्षा कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठे हैं। सोनगाड़ में बीआरओ की ओर से बनाई जा रही सुरक्षा दीवार का करीब 50 मीटर हिस्सा धंसकर नदी में बह गया। स्थानीय लोगों का दावा है कि निर्माण के करीब 22 दिन बाद ही दीवार में दरारें दिखाई देने लगी थीं।

लिम्चागाड़ में भी सड़क के नीचे बनाई गई आरसीसी और वायरक्रेट सुरक्षा दीवार में धंसाव की शिकायत सामने आई है। स्थानीय लोगों ने निर्माण कार्यों की तकनीकी जांच की मांग की है।

बीआरओ के कमांडर राजकिशोर ने सोनगाड़ में सुरक्षा दीवार के बहने की पुष्टि करते हुए बताया कि मामले की जांच के लिए कमेटी गठित की जा रही है। जांच में लापरवाही सामने आने पर कार्रवाई की जाएगी।

तमक नाला उफना, मलारी के आगे आवाजाही प्रभावित

चमोली में तमक नाला उफान पर आने से नाले पर बना पुल क्षतिग्रस्त हो गया। इसके चलते मलारी से आगे आवाजाही प्रभावित हुई। घटना में फिलहाल किसी जनहानि की सूचना नहीं है। पुलिस, प्रशासन, एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की टीमें मौके के लिए रवाना की गईं और स्थिति पर नजर रखी गई।

उत्तरकाशी में भी यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग के कई हिस्सों में मलबा और बोल्डर आने से यातायात प्रभावित हुआ है। पालीगाड, सिलाई बैंड, जंगलचट्टी, दुर्बिल, बनास और अन्य स्थानों पर मार्ग खोलने का काम जारी रहा।

टिहरी के 940 गांवों पर भूस्खलन का खतरा

इस बीच टिहरी गढ़वाल को लेकर सामने आए एक वैज्ञानिक अध्ययन ने भी चिंता बढ़ा दी है। अध्ययन में **करीब 940 गांवों को उच्च या अति-उच्च भूस्खलन संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों** में पाया गया है।

शोधकर्ताओं ने टिहरी के करीब 1,600 पुराने भूस्खलन स्थानों और 17 अलग-अलग भौगोलिक एवं पर्यावरणीय कारकों के आधार पर भूस्खलन संवेदनशीलता का मानचित्र तैयार किया। इनमें ढलान, ऊंचाई, बारिश, नदी से दूरी, मिट्टी, भूगर्भीय संरचना, वनस्पति, सड़क से दूरी और भूमि उपयोग जैसे कारकों को शामिल किया गया।

अध्ययन के अनुसार नदी से दूरी सबसे प्रभावशाली कारक रही। इसके बाद ऊंचाई, ढलान, वर्षा और वनस्पति सूचकांक का महत्वपूर्ण योगदान पाया गया।

दक्षिणी और पश्चिमी टिहरी ज्यादा संवेदनशील

अध्ययन में टिहरी के दक्षिणी, पश्चिमी और मध्य हिस्सों को अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील पाया गया, जबकि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में संवेदनशीलता कम रही।

करीब **500 गांव अति-उच्च** और लगभग **440 गांव उच्च भूस्खलन संवेदनशीलता** वाली श्रेणी में पाए गए। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि इन सभी गांवों में भूस्खलन होना तय है, बल्कि वैज्ञानिक आकलन के अनुसार इन क्षेत्रों में भूस्खलन की संभावना अपेक्षाकृत अधिक है।

शोध में चिला, लोल्डी, चांठी, घड़ियालधार, पाली तल्ली और कांडी जेठुकी जैसे गांवों को अति-उच्च संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों के उदाहरण के तौर पर चिन्हित किया गया है।

बारिश के साथ बढ़ता है खतरा

वैज्ञानिकों के मुताबिक भारी बारिश के दौरान पानी जमीन में रिसकर मिट्टी और मलबे को कमजोर कर सकता है। नदी के आसपास कटाव और ढलानों के आधार के कमजोर होने से भी भूस्खलन की संभावना बढ़ती है। टिहरी की जटिल भूगर्भीय संरचना, ढलान, वर्षा और मानवीय गतिविधियां मिलकर इस जोखिम को बढ़ा सकती हैं।

अध्ययन में उच्च संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों में ढलान स्थिरीकरण, बेहतर जल निकासी, वनीकरण, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और खतरा क्षेत्र निर्धारण जैसे उपायों पर जोर दिया गया है।

फिलहाल मानसून के सक्रिय रहने के कारण उत्तराखंड में सड़क, भूस्खलन और भू-धंसाव से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे में प्रशासन के सामने एक ओर बंद मार्गों को तत्काल खोलने की चुनौती है तो दूसरी ओर संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी बड़ी जिम्मेदारी है।