बिग ब्रेकिंग: लिव-इन और विवाह पर हाईकोर्ट के अहम फैसले। बिना तलाक लिव-इन अवैध, शादी में सहमति ‘गैर-प्रासंगिक’

लिव-इन और विवाह पर हाईकोर्ट के अहम फैसले। बिना तलाक लिव-इन अवैध, शादी में सहमति ‘गैर-प्रासंगिक’

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवाहित व्यक्ति के लिव-इन पर सख्ती दिखाई, जबकि डिवीजन बेंच ने दी राहत
  • मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वैवाहिक संबंधों पर बड़ा कानूनी दृष्टिकोण रखा

देहरादून। देश की न्यायपालिका से हाल ही में आए दो महत्वपूर्ण फैसलों ने लिव-इन रिलेशनशिप, विवाह और वैवाहिक अधिकारों को लेकर बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के इन निर्णयों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं।

बिना तलाक लिव-इन ‘कानूनी नहीं’: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने 20 मार्च को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति पहले से विवाहित है और उसका जीवनसाथी जीवित है, तो वह बिना तलाक लिए किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में कानूनी रूप से नहीं रह सकता।

कोर्ट ने यह टिप्पणी उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें एक ऐसे जोड़े ने सुरक्षा की मांग की थी, जो पहले से अलग-अलग लोगों से विवाहित थे और साथ रह रहे थे।

अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता पूर्ण नहीं होती और एक व्यक्ति का अधिकार दूसरे के वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस सुरक्षा देना संभावित रूप से भारतीय दंड संहिता की धारा 494/495 के तहत अपराध को संरक्षण देने जैसा होगा, इसलिए रिट ऑफ मैंडमस जारी नहीं किया जा सकता।

डिवीजन बेंच ने दिया अलग संदेश

दिलचस्प रूप से, इसी हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना ने एक अन्य मामले में कहा कि यदि कोई विवाहित पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन में रहता है, तो यह अपने आप में अपराध नहीं है।

कोर्ट ने नैतिकता और कानून को अलग रखते हुए कहा कि सामाजिक धारणाएं न्यायिक फैसलों को प्रभावित नहीं कर सकतीं। बेंच ने जोड़े को अंतरिम राहत देते हुए गिरफ्तारी पर रोक लगाई और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए।

शादी में सहमति ‘कानूनी रूप से महत्वहीन’: एमपी हाईकोर्ट

वहीं, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अलग मामले में टिप्पणी की कि एक पति द्वारा अपनी वयस्क पत्नी के साथ बनाया गया यौन संबंध बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता।

जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की बेंच ने IPC की धारा 375 के अपवाद 2 का हवाला देते हुए कहा कि विवाह के भीतर सहमति का सवाल कानूनी रूप से अप्रासंगिक हो जाता है।

यह टिप्पणी उस मामले में आई, जिसमें पति के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और यौन शोषण के आरोप में दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की गई थी।

कोर्ट ने पाया कि कई आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं, जिसके चलते IPC की धारा 377 के तहत कार्यवाही को रद्द कर दिया गया, जबकि अन्य धाराओं में केस जारी रहेगा।

क्या कहते हैं ये फैसले?

इन दोनों हाईकोर्ट के फैसलों से यह साफ होता है कि,

  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वैवाहिक अधिकारों के बीच संतुलन अब भी न्यायिक बहस का विषय है।
  • लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर अदालतों का रुख परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।
  • विवाह संस्था के भीतर यौन संबंधों को लेकर मौजूदा कानून अभी भी पारंपरिक ढांचे पर आधारित है।

देश की अदालतों के ये फैसले न केवल कानूनी दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हैं, बल्कि समाज में बदलते रिश्तों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारंपरिक वैवाहिक व्यवस्था के बीच टकराव को भी उजागर करते हैं। आने वाले समय में इन मुद्दों पर उच्चतम न्यायालय की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो सकती है।