बिग ब्रेकिंग: हाईकोर्ट के बड़े फैसलें। एससी आयोग का बेदखली आदेश रद्द, किसानों को भी राहत

हाईकोर्ट के बड़े फैसलें। एससी आयोग का बेदखली आदेश रद्द, किसानों को भी राहत

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में उत्तराखंड अनुसूचित जाति आयोग के अधिकारों की सीमा स्पष्ट करते हुए जमीन से बेदखली के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि आयोग केवल सिफारिश कर सकता है, बाध्यकारी आदेश जारी करने का उसे अधिकार नहीं है।

आयोग के आदेश पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकल पीठ ने राजेंद्र प्रसाद कबटियाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय सुनाया। याचिकाकर्ता ने मई 2024 में आयोग द्वारा दिए गए उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अधिकारियों को एक भूखंड से बेदखली के निर्देश दिए गए थे।

सुनवाई के दौरान आयोग ने स्वयं माना कि वह केवल कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है, सीधे बेदखली का आदेश देने का अधिकार उसके पास नहीं है। इस पर अदालत ने कहा कि आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है।

आदेश रद्द, वैकल्पिक कानूनी रास्ते खुले

हाईकोर्ट ने आयोग के आदेश को निरस्त करते हुए दोनों पक्षों को कानून के तहत उपलब्ध वैकल्पिक उपाय अपनाने की छूट दी है।

ग्रीष्मकालीन धान पर भी किसानों को राहत

इसी सुनवाई के दौरान अदालत ने किसानों से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में भी राहत दी। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उधम सिंह नगर जिला प्रशासन द्वारा ग्रीष्मकालीन धान की खेती पर लगाए गए प्रतिबंध को रद्द कर दिया।

अदालत ने कहा कि बिना किसी स्पष्ट कानूनी प्रावधान के किसानों को अपनी पसंद की फसल उगाने से नहीं रोका जा सकता।

प्रशासन के आदेश पर कोर्ट की आपत्ति

जिला प्रशासन ने 4 फरवरी 2026 के आदेश में केवल जलभराव वाले खेतों में ही धान की खेती की अनुमति दी थी, जबकि अन्य क्षेत्रों में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था।

राज्य सरकार ने इसका आधार वैज्ञानिक संस्थानों की रिपोर्ट को बताया, जिसमें भूजल स्तर और मिट्टी की गुणवत्ता पर असर की बात कही गई थी। हालांकि, किसानों की ओर से पेश वकीलों ने तर्क दिया कि किसी भी प्रतिबंध के लिए कानूनी आधार होना जरूरी है।

किसानों के पक्ष में फैसला

अदालत ने सभी याचिकाएं स्वीकार करते हुए विवादित आदेश को रद्द कर दिया और किसानों को यह स्वतंत्रता दी कि वे अपनी जमीन पर ग्रीष्मकालीन धान की खेती कर सकते हैं, चाहे भूमि जलमग्न हो या नहीं।

इस फैसले से एक ओर जहां आयोगों के अधिकारों की सीमाएं स्पष्ट हुई हैं, वहीं दूसरी ओर किसानों के अधिकारों को भी मजबूती मिली है।