बिग ब्रेकिंग: “क्या हिंदुओं को भी घर में पूजा से रोकेंगे” नमाज़ विवाद पर HC की टिप्पणी

“क्या हिंदुओं को भी घर में पूजा से रोकेंगे” नमाज़ विवाद पर HC की टिप्पणी

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रमज़ान के दौरान नमाज़ पर कथित रोक के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार से कड़ा सवाल किया है।

अदालत ने पूछा कि अगर मुसलमानों को अपनी निजी संपत्ति पर नमाज़ पढ़ने से रोका जा सकता है, तो क्या हिंदुओं को भी अपने घरों में सामूहिक पूजा करने से रोका जाएगा?

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ संभल जिले में नमाज़ पढ़ने पर लगाए गए कथित प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को अपने घर की छत पर नमाज़ पढ़ने से कैसे रोका जा सकता है। कानून का राज सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार की मांग करता है और संविधान सर्वोपरि है।

अदालत ने राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल से यह भी पूछा कि क्या इसी तरह के प्रतिबंध मंदिरों में होने वाली पूजा पर भी लगाए जाते हैं।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य केवल उसी स्थिति में हस्तक्षेप कर सकता है, जब धार्मिक गतिविधियां सार्वजनिक सड़क या सार्वजनिक स्थान पर फैलने लगें। यदि प्रार्थना पूरी तरह निजी संपत्ति के भीतर हो रही है तो उसमें हस्तक्षेप का कोई सवाल नहीं है।

मामले में याचिकाकर्ता मुनाजिर खान ने आरोप लगाया कि प्रशासन उन्हें उस स्थान पर नमाज़ पढ़ने से रोक रहा है, जिसे वह मस्जिद बताते हैं।

हालांकि अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई में पाया कि याचिका में संपत्ति के क्षेत्रफल और विवरण को लेकर विसंगतियां हैं और प्रस्तुत दस्तावेजों में स्थल की वास्तविक तस्वीरें भी नहीं हैं।

राज्य सरकार ने भी अदालत को बताया कि राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित संपत्ति निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज है और वहां मस्जिद नहीं बल्कि एक मकान है।

इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि वह ढांचा मस्जिद नहीं है और संभवतः मकान भी नहीं बल्कि केवल एक कमरा है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि नमाज़ के बाद किसी प्रकार के भड़काऊ भाषण नहीं होने चाहिए। ऐसा होने पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

इससे पहले 27 फरवरी को हाईकोर्ट ने प्रशासन के उस आदेश को भी खारिज कर दिया था, जिसमें कानून-व्यवस्था के आधार पर उस स्थान पर केवल 20 लोगों को नमाज़ पढ़ने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने तब कहा था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है और यदि प्रशासन इसे संभालने में सक्षम नहीं है तो उसे पद छोड़ देना चाहिए।