बिग ब्रेकिंग: “या अल्लाह! रसगुल्ला! दही भल्ला!” टिप्पणी मामले में भारती सिंह और शेखर सुमन को राहत, FIR रद्द

“या अल्लाह! रसगुल्ला! दही भल्ला!” टिप्पणी मामले में भारती सिंह और शेखर सुमन को राहत, FIR रद्द

मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कॉमेडी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में राहत देते हुए कॉमेडियन भारती सिंह और अभिनेता शेखर सुमन के खिलाफ वर्ष 2010 में दर्ज FIR को रद्द कर दिया है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कॉमेडी प्रस्तुति में खाने-पीने की वस्तुओं का उल्लेख मात्र धर्म का अपमान नहीं माना जा सकता।

क्या था मामला?

मामला टीवी शो कॉमेडी सर्कस का जादू के 4 सितंबर 2010 को प्रसारित एक एपिसोड से जुड़ा है। इस एपिसोड में भारती सिंह ‘उमराव जान’ के किरदार में थीं और उन्होंने हास्य प्रस्तुति के दौरान “या अल्लाह! रसगुल्ला! दही भल्ला!” जैसे संवाद बोले थे। उस समय शो में शेखर सुमन जज की भूमिका में थे।

इस संवाद को लेकर धार्मिक भावनाएं आहत होने का आरोप लगाते हुए रज़ा अकादमी के तत्कालीन पदाधिकारी द्वारा शिकायत दर्ज कराई गई थी, जिसके आधार पर IPC की धारा 295A के तहत FIR दर्ज हुई।

कोर्ट की टिप्पणी

सिंगल बेंच के न्यायाधीश जस्टिस अमित बोरकर ने सुनवाई के दौरान कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल कलाकारों या कार्यक्रमों के खिलाफ “यूं ही” नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत ने कहा कि,  केवल किसी व्यक्ति के आहत होने से अपराध सिद्ध नहीं होता। IPC की धारा 295A IPC तभी लागू होगी जब कृत्य जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से किया गया हो। आरोपी को उस इरादे से जोड़ने के लिए पर्याप्त साक्ष्य होना आवश्यक है।

कोर्ट ने पाया कि उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ताओं का उद्देश्य धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना था।

अदालत ने माना कि संबंधित संवाद कॉमेडी स्क्रिप्ट का हिस्सा था और उसे संदर्भ से हटाकर देखा गया। दुर्भावनापूर्ण इरादे के अभाव में मामला आपराधिक अपराध की श्रेणी में नहीं आता। इन्हीं आधारों पर अदालत ने सितंबर 2010 में दर्ज FIR को रद्द कर दिया।

क्यों अहम है फैसला?

यह निर्णय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मनोरंजन उद्योग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी प्रस्तुति को अपराध मानने के लिए ठोस साक्ष्य और स्पष्ट दुर्भावना का होना अनिवार्य है।