सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च पर नोटिस किया जारी, PIL पर केंद्र से जवाब तलब
नई दिल्ली। राजनीतिक दलों द्वारा अनियंत्रित चुनावी खर्च के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम कदम उठाते हुए जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया है। यह याचिका कॉमन कॉज और सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (CPIL) द्वारा दायर की गई है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।
क्या है याचिका का मुख्य मुद्दा?
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि वर्तमान कानून चुनाव के दौरान उम्मीदवारों द्वारा किए जाने वाले खर्च पर सीमा तय करता है, लेकिन इन सीमाओं का प्रभावी पालन नहीं हो रहा है।
उन्होंने दलील दी कि यदि कोई व्यक्ति उम्मीदवार की ओर से खर्च करता है तो उसे उम्मीदवार के चुनावी खर्च में जोड़ा जाता है, लेकिन राजनीतिक दल द्वारा किए गए खर्च को उम्मीदवार के खर्च में शामिल नहीं किया जाता।
याचिका में कहा गया है कि राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च पर कोई स्पष्ट वैधानिक सीमा नहीं है, जिससे चुनाव प्रक्रिया में धनबल का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
अदालत की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने नियमन की व्यवहारिक कठिनाइयों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि किसी उम्मीदवार के मित्र या समर्थक उसके समर्थन में खर्च करते हैं और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत उचित ठहराते हैं, तो ऐसे खर्च को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि खर्च पर अधिकतम सीमा तय की जाती है, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी जा सकती है।
चुनावी बांड मामले का हवाला
प्रशांत भूषण ने अपने तर्कों में चुनावी बांड मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि अनियंत्रित चुनावी फंडिंग लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। उन्होंने कहा कि चुनाव प्रक्रिया में समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए पारदर्शिता और खर्च की सीमा आवश्यक है।
याचिका में क्या मांग की गई?
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन की मांग की गई है।
साथ ही, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77(1) और चुनाव आचरण नियमों के नियम 90 का हवाला देते हुए कहा गया है कि उम्मीदवारों के खर्च पर तो सीमा है, लेकिन राजनीतिक दलों के खर्च पर ऐसी कोई सीमा निर्धारित नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च को विनियमित करने और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरण भी पेश
याचिका में यह भी कहा गया है कि कई लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च पर सीमा निर्धारित है। उदाहरण के तौर पर यूनाइटेड किंगडम में राजनीतिक दलों के अभियान खर्च को कानून के तहत नियंत्रित किया जाता है और उल्लंघन पर दंड का प्रावधान भी है।
संसदीय लोकतंत्र पर असर का दावा
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि अनियंत्रित खर्च के कारण भारतीय चुनावों में “राष्ट्रपति शैली” का प्रभाव बढ़ रहा है, जिसमें भारी धनराशि खर्च कर एक ही नेता को केंद्र में रखकर प्रचार किया जाता है।
यह प्रवृत्ति संसदीय लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत बताई गई है। मामले की अगली सुनवाई में केंद्र सरकार का रुख स्पष्ट होने की उम्मीद है।



